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सोमवार, 18 मार्च 2024

दिशासूचक

१.


जैसे बहुत सारे पतले-पतले तार 

एक साथ मरोड़े गए हों 

वैसे गुंथी सी लकीरें 

कई गाड़ियों की बत्तियाँ

पल भर के लिए प्रवाह के गुच्छ से बाहर आकर 

पुनः लौट जाती हैं प्रवाह में 

कुछ देर तक तुमने सोचा होगा कि हाइवे छोड़कर 

मुड़ लिया जाए गली में

ओझल हो जाया जाए इस झमेले से 

फिर घबराकर मोड़ लिया 

स्टीयरिंग फिर से 

ठीक प्रवाह के केंद्र की ओर  

और बढ़ चले समाज की गर्दन की ओर पुनः 


मैप्स के वैकल्पिक पथ सुझावों ने भी चुप्पी साध ली है 

गोया कि गहन चिंतन मनन 

का दारोमदार उठाया हो 


चुम्बक सा खींचता प्रवाह 

निषिद्ध करता है ठीक से साँस लेना 

लहरों के बीच के बुलबुले काफी होने चाहिए 

आख़िर संचय शक्ति का, है ज़रूरी 

किसी बाँध, किसी सिग्नल पर काम आवेगा 

अभी बगल में दौड़ती किसी गाड़ी से 

तुम्हारा क्या ही लेना-देना है 


पर प्रवाह की गति अब मंथर हो चली है 

सब इन्द्रियाँ व्यस्त है अब 

स्टीयरिंग पर हाथ कस गए हैं 

कुछ पुलिस वाले लट्ठ लिए 

ऐसे दिखना चाहते हैं जैसे हांक रहें हो एक तालाब को 

अचानक तुम्हें क्रोध आता है 

दौड़ कर सड़क पार करती एक महिला पर 

तुम पहचान सकते हो विकृत भृकुटियाँ 

अगल-बगल के शीशों के पीछे

अंततः दबा ही देना होगा 

ब्रेक


२.


हर मिनट लेन बदलते, गरियाते, भोंपू बजाते 

कुछ हज़ार ड्राईवर 

पच्चीस मीटर बाई पच्चीस मीटर में 

इकट्ठे हुए 

नफासत से सटे, पैक होकर 

बेतरतीब दिशासूचक बने बिखरे हैं 

शहर की धमनी में एक विशालकाय थक्के की भांति


तुम्हारे कपाल की नसें गांठों में कसमसा रहीं हैं 

तुम्हारे पेट गुड़गुड़ाते हैं भूख से तिलमिलाते 

माथे की सलवटों पर इस्तरी सी करते

कारों के बीच से सड़क पार करने का रास्ता ढूंढते लोगों

की जान बख्शते

तुम 


ट्रैफिक सिखाता है तुन्हें सोचने की तमीज़

या बद-तमीज़, पक्के से कहना मुश्किल है 

जहाँ समस्याओं की जड़ तक पहुँच कर 

मुर्गियों और अण्डों की बहस में तुम नहीं पड़ते 

बस मान लेते हो कि 

तुम्हारी कार की चहारदीवारी 

विभाजन रेखा है प्रकृति और पुरुष की 

परस्पर गुंथे तार शायद बाँट लेते हो कुछ इलेक्ट्रान 

पर उनके बीच लगभग तिकोनी घाटियों में भरी हवा 

काफी है कहने को कि 

"माइंड योर ओन बिझनस"


कि मानवता-मानवता खेलना अच्छी बात है 

पर प्रेम की पींगें तुम अपने मोहल्ले में घुस कर बढ़ाना 

तुम्हारे खिलखिलाते भंवर 

तुम्हारे ट्रांस-ह्यूमन सरोकार 

परे धरो 

और ये देखो कि गला फाड़ कर चिल्लाते 

बड़बोले की गाड़ी तुमसे कितनी समानांतर है

दिशासूचकों के अवकलन-समाकलन में 

तुम्हारे सलामत निकलने की कितनी सम्भावना है 

किस तरफ़ बन्दर घुड़कियाँ 

और किस तरफ़ साझा झल्लाहट भेजी जानी है 

कि बत्ती हरी हो 

और तुम ऐसा एक्सेलरेटर दबाओ

रुको फिर 

अपने अंतर्मन में जाकर ही 

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

चुप्प चीख

 

थरथराते हुए

बॉल पेन का

गोल गुल चलने लगता है 

मलेरिया बुखार सा 

एक क्षण रफ़्तार से

फिर अवरोह में मंथर

गहरे गड्ढे में गिरने से ख़ुद को रोकता 


कोई सांड 

लकड़ी के दरवाज़े पर बार-बार 

सिर मारता है 

दरवाज़ा पसीने से लथपथ, चरमराता है 

फिर धीमे से साँस लेता 

अपनी जगह वापस आता है 

अपने जीवन के बचे खुचे क्षण गिनता 


फिर

वो दहाड़ कर टूटता है

अँधेरी गहराइयों में उसके

परखच्चे उड़ जाते हैं


परखच्चे उड़ जाते हैं

पन्नों के, जिल्द के

गुल खुरचता है खाली पन्नों को इतना

ऊपर नीचे दाएं-बाएं

किसी चीख की अवशिष्ट तरंग सा


नीचे, जमीन हो जाती है तितर-बितर

क्षीण हो जाता है एक ग्रह का केंद्र

और

बॉलपेन झल्लाता घिसटता रहता है

अँधेरी, रिक्त दिशाओं में

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

काश / आशीष बिहानी

काश कि एक ईश्वर होता
शब्द और शक्ति का बना ब्रह्म
देश और काल के धागों में बसी चेतना होती
होते पाप-पुण्य, नैतिक और अनैतिक

काश कि हम जन्म लेते वापस, और जीते जीवन को
सुधार कर पाते ग़लतियों का
जब तक जी न लेते हर क़तरे को दक्षता से हम
काश कि कोई कहीं सुन पाता
हमारी कराहें और किलकारियाँ
बुतों में बैठा, हवा में घुला
लड़ने आते हमारे लिए देवी-देवता
हमारी लड़ाईयाँ
शक्ति ख़ुद स्वीकार करती बलि
काश कि एक ईश्वर होता
तो हम उसे दे देते ज़िम्मेदारी
ख़ुद को माफ़ करने की
और ठीक करने की,
अपनी मूर्खता के विकराल परिणामों को

बुधवार, 14 नवंबर 2018

सुरसा के मुख से : हमारे जमाने के भय : स्क्रीन


समक्ष खड़े शख्स के शब्दों से भागते हुए
उसके चेहरे के उतारों और चढ़ावों पर निगाह सरकाते हुए
तुम धीरे धीरे नीचे आते हो
और अन्यमनस्कता को बड़े यत्न से छुपाकर
आर्त्त बेबसी जाहिर करते हुए
कान खड़े किये फ़ोन की तरफ देखते हो
नोटिफिकेशन या मैसेज न हो तो समय ही देख लो

पर
स्क्रीन में
एक घातक दरार है
भाग कर तुम लैपटॉप का फ्लैप खोल कर देखते हो
बातचीत के प्रवाह पर बड़ी अशिष्टता से कुल्हाड़ी चलाकर
उद्विग्नता तुम्हारी एक झटके से झन्नाकर पहाड़ी से कूद जाती है
टूटी हुई स्क्रीन के चर्राकर बाहर आए कोनों के पीछे
सिलिकॉन की हरी सर्किट छपी परत की झलक
त्राहि! त्राहि!
कलाई पर पहनी स्मार्टवाच पर रग्गे आ लगे हैं कहीं से
कुछ कह पाने की हालत में नहीं है वो
डेस्कटॉप, किंडल, टेबलेट
किसी अनदिखे स्क्रीन-संहार की शिकार हो चुकीं
घबराहट के मारे लम्बी सांस लेकर तुम
यह मानने की कोशिश करते हो
कि तुम ब्रह्माण्ड में अकेले हो
तुम्हारी कनपटियों से पसीने के नाले बह चलते है
और नसों की धमक से छत हिलने लगती है
स्वप्न से झटके से उठकर
१२X१२ के शीशे में
देखते हो अपनी भयातुर आकृति को
काश पिक्सलर उसे
टच अप करके, लाइकेबल बना कर
इन्स्टाग्राम पर पोस्ट करने की गुज़ारिश करे तुमसे
अधीर होकर दिलासा देते हो स्वयं को
दुनिया से सीधे बात करते वक़्त भी तुम
लगभग वही काम करने की क्षमता रखते हो...
पर क्या सच में?

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

नामकरण किया नहीं इसका दो साल से, पता नहीं क्यों

मजारों के दरवाज़े
तोड़ दिए गए हैं
भग्न कर दिए गए हैं
मंदिर
थरथरा रहे हैं मसीहाओं
के बुत
और लोट रहे हैं भांति भांति के गुम्बद
अवशिष्टों के ढेर में 


ढोंगी श्रद्धालुओं की भीड़
घुस गयी है बारहदरी में
जूते लिए ही
बरसा रहे हैं वो अपनी श्रद्धा
संगमरमर के फ़र्श पर
खटखटकर चलते हुए
पण्डे, पादरी और मुल्ले रो रहे हैं
विकृत शक्लें बनाकर
धाड़ें मारते

राजधानी के अन्धेरे कमरों में
खाली कटघरों को सजा सुनाते हैं न्यायाधीश
कमेटियां बनेंगी
मुआवज़े का बँटवारा होगा विजेताओं के बीच
प्रतिनिधि जाएँगे
मानवों की भोंडी नकलों के पास
देवहीन, दैवहीन
पुनः प्रतिष्ठित करेंगे
विश्वास और श्रद्धा की दुकानें
कहेंगे,
"परेड, तीनों तीन कॉलम में
झुक जाओ आगे की ओर कच्छे उतार कर;
हम तुम्हारे पिछवाड़ों पर ख़ुशी पोत देंगे!"

उनके निर्देशों का
अक्षरशः पालन होगा
क्योंकि सम्मान और अपमान के मसले
बहुत महत्वपूर्ण हैं हमारे लिए

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

कॉलोनी - 1

(द व्यूज़ एक्सप्रेस्ड हियर डू नॉट रिफ्लेक्ट दोज़ ऑफ़ दि ऑथर)
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रिहायशी इलाक़े में
अलग-अलग मंज़िला औक़ात वाले
हम सैकड़ों पक्के मकान
ऊटपटांग तरीक़े से जमघट बनाए
बैठे हैं उकडू
अपनी-अपनी गोद में
मोटरसाइकलों और कारों का जमावड़ा बिछाए
फुसफुसाते हैं
ठंडी हवा में ठिठुरते
ताकि सुनाई न दे
टेम्पल्स-चर्चेज़-सुपरमार्केट्स
इत्यादि पूजा के स्थलों को
हमारी हठभरी ईशनिंदा


आए बड़े पवित्रता और अनुशासन के गड़गुम्बे
कौनसे वो आज़ाद हैं इंसान की ख़रीद-फ़रोख्त से
ऊँच-नीच से
कमसेकम घरों में लोग रहते हैं प्राकृत अवस्था में
अपनी फितरतों के सबसे क़रीब

यों धूनी रमाकर
या सुफैद परिधान ओढ़कर
खूबसूरत टोपियाँ पहनकर
कोई भुला नहीं देता नग्न फिरने का आनंद

दिन भर चन्दन मलकर
अपने परिवेश का मल दूर करके
इत्र से नहाकर भी
अंततः इन लोगों के शरीर से
निकलेगी तो टट्टी ही

रविवार, 3 दिसंबर 2017

फैरो

वहाँ गाँव के बाहर
धोरों के बीच टट्टी करते बुड्ढे का सर
किसी ने दग्गड़ से कुचल दिया
शिनाख्त नहीं कर पाए उसके नज़दीकी रिश्तेदार

रेबीज़ से सनके कुत्तों का झुण्ड
बावला हुआ सड़क से उतर गौशाला के पास
घाटी में गहरे उतर गया
उनकी लाशें कई किलोमीटरतक छितराईं पायी जायेंगी
फूली, गंधाती

धोरे पर बबूलों के झुरमुट
और गन्दगी के ढेरों के बीच कोई लोमड़ी
क्रोध भरी हूक रही है

सुबह सेना के काफिले के आख़िरी ट्रक के निकलने से पहले
एक हिरण धैर्य खो बैठा
चीलें उसके अंतरंगों को कई दिन खाएंगी
उसके हड्डी और चमड़े के ओरीगामी में बदल जाने तक

चींटियों के नगर पर पपड़ियाई भूमि पर
चींटियाँ फिरतीं हैं कूदती फाँदतीं
किसी फैरो की तरह चमकती स्वर्णिम देह लिए
एक समाज में रहने में निष्णात

राजधानियों के लोग यहाँ की तस्वीरें देख कर नाक भौं सिकोड़ते हैं
और कहते हैं कि कोई जीना सिखाओ इन गवारों को.

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

कठोर

रेत और ठण्ड ने यहाँ की रातों के चेहरे
कठोर कर दिए हैं
उनमें धोरों की छाहें और बादलों की सलवटें हैं
उनकी आँखों में सितारों की साफ़-सुथरी झिलमिलाहट है
पथरीली राहों पर वो बिछातीं हैं प्रलय का शोर
और छोटे मोटे झरने
लबालब नदियों का खालीपन उनकी आँखों से बहता है
इस्पात के जंजाल में उनकी खनखनाती हँसी

अन्धकार में घिसटते विस्थापितों से विमुख वो
चाँद का दीर्घ निःश्वास छोड़तीं हैं
वो अपने शरणार्थियों
को पुचकार कर बुलातीं नहीं हैं
बस देखतीं रहतीं हैं भावहीन
जैसे कोई देखता है किसी रेल के जाने को
जिसमें उसे चढ़ना नहीं है

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

बकरी के लिए रसगुल्ले


हिनहिनाते हुए स्कैनर्स
तेज, गोल मटोल और दक्षिण को झुके हुए
खुली अलमारियों में
इतिहास की घोड़ेदार किताबें
जैसे कोई छुई-मुई


बारह बहियाँ, दो सौ पेट
अपने में ब्रह्माण्ड समेट

नहींनहीं
येक्यालिखदिया
फिरसेलिखनापड़ेगा

तेज, गोल मटोल और दक्षिण को झुके हुए
गुम्बदों के भाल पर चीथड़े सूखे हुए
स्कैनर्स -- हिनहिनाए
भरा गुड़कता लोटा, खोट समेत ही लौटा
उसकी धृष्टता पर हमें खेद है
पर इसमें रेल का देरी से चलना कारण नहीं है
हटाओयारकुछऔरलिखतेहैं
साक्षात् अल्ला की मर्ज़ी से
हैं?

अल्ला? अल्ला यहाँ लूणी के घाटों की देवी है
सब घाटों की
उनके सर पर काँटों का ताज़ है
और अधोवस्त्र के तौर पर स्क्विड के छुअन्तुओं का घाघरा
हम और किसी अल्ला को नहीं जानते
---
तो साक्षात् अल्लाबीबी की मर्ज़ी से
सिसीफस पत्थर लुढ़काता बीबी के गुणगान करता आगे बढ़ा
चोटी पर पहुँचकर उसने सूखते चीथड़ों में से एक
बीबी के नोन-इश्टोप सेवक पहाड़ी बकरे को दिया
और पत्थर को दक्षिण दिशा की ढाल पर रवाना किया
ग्रामीणों ने बीबी की पीठ की ओर से आते पत्थरको
उनका प्रसाद माना
और वेदों ने उनका गुणगान किया
देवताओं ने पुष्पवृष्टि की
जनसाधारण से जयजयकार किया
प्रसाद लुढ़कता हुआ हेडीज़ पर बने बाँध से जा टकराया
चट-चट-चट करके बाँध फटा
बाँध की डूब में फंसे जीवों और वनस्पति की आत्माओं
को मुक्ति प्राप्त हुई
हेडीज़ अब लूणी बन गयी
पांच साल में एक बार बहती है
घाट उसके किनारे फिर भी बना दिए गए हैं
सभी पर अल्लाबीबी की मूर्तियाँ स्थापित हैं
श्रद्धालुओं का मेला लगता है
जो कोई प्रसाद पाता है, धन्य हो जाता है
स्कैनर्स-लोटे-रेलें हिनहिनाए
वेदों ने उनका गुणगान किया
देवताओं ने पुष्पवृष्टि की
बोल अल्लामाता की जय

अबठीकहै

अरे ठीक कैसे है?
खुली अलमारियों में
इतिहास की घोड़ेदार छुईमुई किताबें?
दिव्य दर्शन से भरे बारह बहियाँ, दो सौ पेट?
उनका क्या हुआ?
लोटे के प्रासंगिक होने का क्या आशय है?
रेल के अप्रासंगिक होने का क्या आशय है?
.
.
.
सुण भेंणचोद
सुबह से पडारा पसार के बैठा
बीबीगान को ध्यान से सुने नहीं है
मैं तब से भूखा-प्यासा अरड़ा रहा हूँ
प्रसाद पा के निकल यहाँ से मुफ़्तखोर


चलो भाय
आज के आनंद की जय
जहां मतिमंद घूमते होकर अभय
सर ऊंचा करके
फ़ोकट में ज्ञान प्राप्त करते
बीबी की उस पावन भूमि की जय
हर हर बहादेव!

बुधवार, 15 नवंबर 2017

चिल्लाओ

गला फाड़ के चिल्लाओ
उगलो किसी ज्वालामुखी की भांति
इतना पागलपन
कि दिशाएं किसी मुद्दत से फ्लश हुए संडास की तरह
ठस जाएं.
ऊटपटांग आकृतियों-आवाजों-गंधों की हिसहिसाती भीड़ में
जमाना भूल जाए कि सीधी पंक्तियों में
ब्लॉक-बाई-ब्लॉक
हमें जमाने की कोई कोशिश भी हुई थी.

सोमवार, 19 जून 2017

मेरे पापा बहुत अच्छे पेड़ हैं


(१)
मेरे पापा बहुत अच्छे पेड़ हैं
उनका हमेशा से सपना था
कि हम अच्छे पेड़ बनें
पर कभी हमसे कहा नहीं

उन्होंने कहा
कि तुम विद्रोह करो
पर शांति से
उनके उघड़ेपन ने हमें भीगने नहीं दिया
उनके कठोर हाथों ने हमारे जीवन में घर्षण नहीं पैदा किया
उनके बाल हवा में सरसराकर भी बिखरते नहीं
उनकी मूंछ कभी चाय से गीली नही होती.

(२)
मेरे पापा बहुत अच्छे पेड़ हैं
घंटों भरी भरकम रजिस्टर लिए बैठे-बैठे
उनके पैर लकड़ी के काउंटर में जड़ें जमा लेते हैं
सहज कर देते हैं वो
लोगों का आना और बैठना
और प्रलाप करना
वो सुबह जम्हाई लेते हैं तो
शेष बची थकान
पीठ से जड़ों की मिट्टी बांधे निकल आती है

(३)
मेरे पापा बहुत अच्छे पेड़ हैं
वो टस से मस नहीं हुए
मृत्यु और ऊब की डूब में
उनकी जड़ों में गांठें हैं
संस्थागत ऋण
रीति-रिवाज़
भूमंडलीकरण और व्यक्तिवाद
नियम-कानून
व्यापार और विचार
कहीं गहरे दबे हैं
भयावह युद्ध की राख
किसी के धुंधले कड़वे बोल
कई समानांतर विश्व
जमाए हुए पकड़
पानी की खोज में
बहुत गहरे

गुरुवार, 15 जून 2017

चन्द्रकला: बारिश

आंधी के झकझोरे पेड़
ने झाड़ दी
घंटों से संजोई बारिश
भिगो दिया मुझे
जैसे, चन्द्रकला, तुम
फट पड़ती हो खिलखिलाहट से
मेरा कोई उद्दंड मज़ाक सुनकर
बरसा देती हो सैकड़ों थपकियाँ

जैसे थपथपाकर मेरी दादी माँ
बाजरे की लोई को
बदल देती हैं
नम सतह वाली चपटी रोटी में
वैसे ही चलता हूँ मैं तुम्हारी बगल में
स्वेद-अच्छादित
अवाक्,
मुस्काता बेढ़ब

बुधवार, 10 मई 2017

उखड़

दीवार-सी कठोर उसकी पीठ पर ठुकी कीलें हिल गयीं
रेशे तैर आए हरे गाढे द्रव के
काई से ढके, मच्छरों से तरबतर
सुगबुगे दलदली तालाब बन गए उसकी आँखों के चारों ओर
धँसती गयी उसकी जड़ें
किसी पुरानी गली में
ले आई है उसकी खोज उसे
कूदते-फाँदते, घिसटते-लटकते
उसकी साड़ी में छेद हो गए हैं
और मति में स्मृतिभ्रंश
अवाक्, उसने सर उठाया
दूर किसी बुड्ढे की खाँसी की भांति
सूने घर की काल्पनिक सांय सांय ने
झकझोरा उसे
पहेली सी गूँजती भाषा में

इसी डूब में कहीं आस पास उसका घर था
जिसके कोनों में उसके भय बसते थे
खेजड़ी के काँटों की तरह जो
रक्षा करते थे रह्स्यों की
जिनको नंगा कर देना था उसे हाड़ा रानी की तलवार से
जहाँ गुसलखाने में फिसल कर उसके नितम्ब का जोड़ हिल गया
दुविधाओं के वक़्त उस चोट की कसक लौट आती अचानक ही
जहाँ घट्टी की गरड़-गरड़ में पहाड़ों का रट्टा भुला जाता था
उनकी जगह आ बैठती थीं
विसंगतियों से लदीं कहानियां
जिसकी पानी की मोटर हेडीज़ की तरह भूतों को कुओं
से निकाल कर धूप में लेटा देती थी
उनकी संतुष्टि भरी आहों से उसके नथुने बेचैन हो उठते थे

उसके घुटनों में दर्द है
पर नितम्ब में कोई कसक नहीं
वो भौचक है कि कैसे कहानियों की डोरियाँ ले आयीं उसे
इधर
जहाँ से वो भागी थी भीगी, अधूरी बुनावटें लेकर
अरबों टिड्डे टकराए थे उसकी पीठ से
एक पत्ती भी साबुत नहीं बची
वहाँ धरती की नसों ने जमा कर दिया है
खालीपन का पीब
और अजनबीयत
ये उसका देश नहीं है
पर ये जगह उसकी है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

दुर्भिक्ष!

आधी फटी सीमेंट की चद्दर में से
झाँकती रेत और कंकड़-पत्थर
दूर तक फैले, आसमान में मिल गए कहीं
जहाँ तक मैं और मेरा भाई टहल आए
दुनिया-जहान की बातें करते करते

कहीं रस्ते में माँ की आवाज़ सुनाई दी
ये क्या कबाड़ फैला रखा है बरामदे में
संभल कर रक्खो ये सब
आसमान के रंग, अचल जल के विशाल चेहरे
ऊंटों की टपकाई गोलियां
रंगे-पुते नकली आदर्श घर
पारदर्शी स्वप्न
कुछ टूट फूट गया तो मुझे ओळमा न देना
संभल-संभल कर कदम रखना

अन्दर रख दो सब कुछ सार सम्हाल कर
जरुरत पड़े तब निकाल लाना

पर हम जानते हैं कहीं गहरे
अंतस में
अगर जमा कर रख दिया इन सबको
किसी ताक में अगर
बिखर जायेंगे रुधिर के सूखे थक्के की भांति ये
तब तुम आसमान की ओर देखकर कहोगी, माँ,
दुर्भिक्ष!

रविवार, 29 जनवरी 2017

झालावाड़

(गर्भनाल के दिसंबर, २०१६ अंक में मेरी दो कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं. ये तीसरी कविता लौटा दी गयी थी)

अढाई पौने-तीन दशक के पड़ाव पर उसे
झालावाड़ के बीहड़ों में किसी सड़क ने अपने पाश में बाँधा
और निगल गई

उसके आगे का सारा जीवन उसने
उधर की
चिपचिपी, गीली अंतड़ियों में बिताया

वहां, जहाँ पानी कम, जहर ज्यादा है
खेतों में मिट्टी कम, पत्थर ज्यादा हैं
जहाँ के बाशिंदे असमय बूढ़े होकर झुक जाते हैं
मृत्यु के सजदे में
मोक्ष के इंतज़ार में
जो कभी नहीं आता

ठीक उसी प्रकार
जैसे, नयी और पुरानी सरकारों के कोई भी जुमले या वादे
नहीं पहुँचते वहां
न ही असर दिखाते हैं कोई

वहाँ गलियों में टट्टियाँ बिखरी हैं
वहाँ हर घर के आंगन में एक बच्चे की लाश गड़ी है
वहाँ हर लड़के के हाथ में गुलेल है
लाशों, टट्टियों और गुलेलों के सहारे
वो लड़ते हैं आज़ादी के लिए
सरकारों से और एक दूसरे से

बुहारी लेकर उसका चलना वहाँ की गलियों में
देता नहीं किसी को उम्मीद
सुलझाता नहीं उसकी ही निराशा

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

विघ्न

तुम कूद पड़े
हज़ारों उफनते नागों के मध्य

तुम्हारी प्रदूषित फुफकारों ने,
तुम्हारी दहाड़ती कदमताल ने
रोएँ खड़े कर दिए चट्टानों के
मिटा दीं पानियों की यादें
अब वो बहते नहीं हाथियों के गालों पर
जब वो सूंड से सहलाते हैं
अपने मरे हुए बच्चों के कंकालों को
वो पानी बर्बाद नहीं कर सकते
दिन-ब-दिन विकराल होते मौत के मंज़र पर

तुमने काट डाले उनके रास्ते
तुम खा गए उनके घर
तुम बढे जाते हो आगे, उनकी आत्माओं की कंदराओं में

सोमवार, 9 जनवरी 2017

दिवास्वप्न

अगर मेरे हाथ ढले होते किसी  बहुत ही मजबूत और कठोर धातु में,
मैं उखाड़ फैंकता 

कागज़ के आवरण
दीवारें-खिड़कियाँ-अलमारियाँ
सीमेंट-ईंटें-टाइल्स
सड़कें-मेट्रो-रेल की पटरियाँ
शहर के विशाल फैलाव
जंगल-जानवर-नदियाँ
घाटियाँ और उनकी हवाएँ
देश और दुनियाएँ


चीथड़े-चीथड़े कर देता
और होम देता आवाज़ों के बवंडर में
जो मैंने बनाए होते अपने हाथों से ही 


पर मैं माँस-हड्डी का कमज़ोर मानव
कोई कार टकरा जाए तो शिनाख्त करना मुश्किल हो जाता है

काश मैं दुर्दम्य होता ...
जब मैं चलता तो खरोंचें पड़ जातीं
धरती की छाती पर
उछलता तो भूचाल आ जाता
मैं बदल देता इस दुनिया का चेहरा अपने माकूल
ये सब सोचते वक़्त मैं नहीं सोचता
क्रमिक विकास के बारे में,
गाया थ्योरी के बारे में

बस जमाता जाता दुनिया के टुकड़े
अपने हिसाब से

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

उसूल

(कुछ दिनों पहले लिखी)

सड़क किनारे पगड़ी बांधे बुढऊ
अपने घुटनों पर कुहनियाँ रखे
करम पर हाथ बांधे
दूर बबूल की झाड़ियों में मूतते कुत्ते को देख रहें हैं
उनके मष्तिष्क में ख़याल कौंधता है
मुसलमान बड़े बढ़ गए हैं आजकल
उनकी चौधराहट छंटती है गाँव में
उनके लड़के जब बाहर निकलते हैं
तो बहु बेटियों को अन्दर टोरना पड़ता है
अगर उनकी लड़की ने किसी मुसलमान के हाथों मुँह काला करा लिया
तो पहले वे उस रांड का गला काटेंगे और फिर अपनी कलाई
(पर ऐसा होगा नहीं, उन्हें भरोसा है)

सड़क के दूसरी ओर
एक दढ़ियल प्रौढ़ लुंगी-टोपी पहने बैठा है उकडू
इन्हें चुरू जाना है, उन्हें बीकानेर
उसके गाँव में हिन्दू बड़े उछलते हैं आजकल
सभ्य-असभ्य, सही-ग़लत की लकड़ियाँ लिए घुमते हैं गुंडई में
वो भी अपनी बेटी का गला काट देगा
अगर उसने एक हिन्दू से शादी की
और कूद जाएगा ज़िन्नात वाले कूएँ में
(पर ऐसा होगा नहीं, उसे भरोसा है)

ये दोनों परिचित हैं एक दूसरे के "उसूलों" और रसूख़ से

पर ये शून्य की गोद भरती, गोद उलीचती संख्याएँ नहीं हैं
जो नफ़रत से नफ़रत को
कष्ट से कष्ट को काटकर शून्य में विलीन हो जाएँ

नहीं

उनके विचारों और "उसूलों" में दिशा है
और ये सदिश राशियाँ एक दुसरे से घुलतीं हैं, मिलतीं हैं
प्राचीन परकोटों से सर फोड़ते बुड्ढों की मिली जुली ताक़तों से
रस्ते नहीं बनते
बनते हैं कारागार
ऊटपटांग खम्भों वाले महल
शीशे के जननांगों वाले पुरुष और स्त्री
जो जन्म देते हैं पारदर्शी, सुघड़ समाजों को
जो किसी भी प्रकार से बदलने से साफ़-साफ़ मुकर गए हैं

सोमवार, 18 जुलाई 2016

समां



कृषि मंडी के दरवाजे पर
चेचाणी जी का पग पड़ गया
बिल्ली की टट्टी पर
गुस्से के मारे उन्होंने अपने करम को गलियाँ दीं
आज नहीं निहार पाएंगे वो
घर के रास्ते पर
शाम की छाँव में लहराते पेड़
और सड़क के दोनों किनारों पर
अभ्रक की चमक

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

चेहरा

आसमान और जमीन के दैनिक कार्यक्रम में
कुचले हुए ऐसे कुछ क्षण होंगे
जब तुम्हें ज़्यादातर चीज़ें याद नहीं रहेंगी

तुम्हें याद नहीं रहेगा कि उस दिन क्या वार था
स्कूल में क्या पढ़ाया था
कोहनी पर कहाँ चोट आई थी
किसने बाग़ से खदेड़ कर भगाया था
या कौनसी सब्जी बनी थी

तुम भूल जाओगे कि
उस दिन टीचर ने खींचकर तमाचा मारा था
और कक्षा के छुट्टे सांडों ने मैदान में खूब दौड़ाया था
तुम भूल जाओगे
कि तुम्हारी गोद में बैठे मासूम पिल्लों की माँ
से तुम मुश्किल से जान बचाकर भागे थे
और अस्पताल के पिछवाड़े में पड़ी गन्दगी में तुम भागे  थे
एक अदना डाम बचने की ख़ातिर

पर उसी उहापोह में कहीं
मम्मी ने अपनी बनी अधहरी-अधखरी स्वेटर
तुम्हारे बालों में फसे तमाम ताम-झाम को
हटा कर फँसा दी तुम्हारे गले में
और इस अनुक्रम के बाद दोनों कन्धों को झंझोड़ दिया
हलके से
उस घर्षण से पैदा हुई गर्मी को गले से लगाए
तुम पोपली हंसी हंसोगे अपनी खाट में पड़े
कहीं दूर भविष्य में
कभी नहीं भूलोगे
हरे जालीदार अँधेरे में जद्दोज़हद करना और
अंततः गुफा के प्रकाशित अंत पर पाना
मम्मी का प्यार से लदा चेहरा