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बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

कॉलोनी - 1

(द व्यूज़ एक्सप्रेस्ड हियर डू नॉट रिफ्लेक्ट दोज़ ऑफ़ दि ऑथर)
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रिहायशी इलाक़े में
अलग-अलग मंज़िला औक़ात वाले
हम सैकड़ों पक्के मकान
ऊटपटांग तरीक़े से जमघट बनाए
बैठे हैं उकडू
अपनी-अपनी गोद में
मोटरसाइकलों और कारों का जमावड़ा बिछाए
फुसफुसाते हैं
ठंडी हवा में ठिठुरते
ताकि सुनाई न दे
टेम्पल्स-चर्चेज़-सुपरमार्केट्स
इत्यादि पूजा के स्थलों को
हमारी हठभरी ईशनिंदा


आए बड़े पवित्रता और अनुशासन के गड़गुम्बे
कौनसे वो आज़ाद हैं इंसान की ख़रीद-फ़रोख्त से
ऊँच-नीच से
कमसेकम घरों में लोग रहते हैं प्राकृत अवस्था में
अपनी फितरतों के सबसे क़रीब

यों धूनी रमाकर
या सुफैद परिधान ओढ़कर
खूबसूरत टोपियाँ पहनकर
कोई भुला नहीं देता नग्न फिरने का आनंद

दिन भर चन्दन मलकर
अपने परिवेश का मल दूर करके
इत्र से नहाकर भी
अंततः इन लोगों के शरीर से
निकलेगी तो टट्टी ही

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

दिनचर्या

हम देखते हैं, आँखों में वितृष्णा भरे
धड़धड़ाती रेलों को, डूबते पुलों को, उठते पहाड़ों को
शांति चाहते हैं, गड़गड़ाहट के अंत में
उसके इंतज़ार में
स्कूटर के पायदान पर बैठकर
अकर्मण्य हो झांकते है
शनिवार सुबह ग्यारह बजे के
तरल निद्रालू यातायात में
जहाँ छोड़ दिए थे मुट्ठी भर भूत
कुछ मिनट पहले
वो नहीं सुनेंगे किसी रखवाली की मनुहार
दौड़ते रहेंगे वीथियों और मुंडेरों पर
रात होने तक
वो सड़क पार करेंगे
सांय-सांय करके निकल जाने वाले वाहनों को छूते हुए
एक दूसरे के हाथ पकड़े
ताकते रहेंगे फिल्मों के आसमान से भी बड़े पोस्टरों को
घंटों

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

मेरी कविता "शाप" का वीडियो




मेरी 58 कविताओं का संग्रह "अन्धकार के धागे" हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित किया गया है. यदि आपको यह कविता पसंद आती है तो इंफीबीम से संकलन की प्रति अवश्य आर्डर करें.


यहाँ में संकलन में से एक कविता, 'शाप' पढ़ रहा हूँ, गौर करें.

रविवार, 31 मई 2015

बचपन ५-८

खेल
चाँदनी के उजास में
झिलमिलाती झील के किनारे
पसरे उजाड़ में
एक छोटा लड़का और एक छोटी लड़की
एक विशाल नारंगी गेंद से
खेल रहे थे;
वो सूर्य था।

स्पीड ब्रेकर
बचपन के मैदानों से निकलकर
छोटी सी छोकरी
प्यार की ढलानों पर 
उत्साह से साईकिल दौड़ा रही थी।
रास्ते में बाँध सा ऊँचा
स्पीड ब्रेकर आया …
साईकिल उछली, लड़की सड़क किनारे खड़े
अचंभित से खम्भे के आधार पर
मुँह के बल गिरी
ठुड्डी फूट गयी, रक्त बह चला।

आधिपत्य
एक गज बाई एक गज की जमीन पर
हमने अपना आधिपत्य घोषित किया
इमारतें, रेलवे स्टेशन, खेत, टंकियाँ,
सड़कें, कीचड़, टेबलें, कुर्सियाँ,
सपने, मिटटी और चुम्बन
इन सबको लेकर शहर बनाया
भीड़ और प्रदूषण से मुक्त
रीसाइकलेबल शहर
आदर्श शहर
दो सींकें गाड़कर कागज़ से स्वागत द्वार बनाया
उसपर लिखा "कॉपीराईट © ऑल राईट्स रिज़र्व्ड"

उत्सव 
कंकड़ पत्थरों से भरे
एक उबड़ खाबड़ मैदान को मैंने
समतल बनाया
और बहत्तर-बीसी कविताएँ
बड़ी नज़ाकत से बिछा दीं

आसमान से देवताओं की जमात
ताली बजाते हुए उतरी;
मेरी कविताओं पर कूद-कूद कर
एक-एक की मिट्टी पलीद कर दी।

गुरुवार, 19 मार्च 2015

सुरक्षा

पीवर लैदर का बैग सहलाते हुए अंकल
अचानक ठिठक कर पास की
दूकान का बोर्ड देखने लगे,
उत्सुकता और जिज्ञासा से …

नीम के पेड़ की पत्तियों के बीच घुसा
जंग लगा बोर्ड
साफ सुथरे तरीके से कुछ
कह नहीं पा रहा था,
सो अपनी जांघ के सहारे
एक ग़ायब-गूंगा ढोलक
बजाते हुए
झड़ती पत्तियों को घूरने लगे।

कुछ दूरी पर
फुटपाथ से उतर कर
असंख्य सूखी पत्तियों का मरघट
रुकी नाली के रिसाव में मिलकर
कीचड़ का रूप ले रहा था;
हर दो मिनट में
हंगामा मचाती सिटी बस
गोली की तरह निकलती,
कीचड को गिट्टी में बराबर कर जाती।

अंकल ने भयातुर होकर देखा
हरीतिमा के अस्थि-पंजरों का कुचला जाना;
अपनी ऐनक से
शोर, पसीना और निराशा पोंछकर
उन्हें एक बेहतर जगह पर
खड़ा होने का निश्चय किया
बस पकड़ने के लिए,
सुरक्षित महसूस करने के लिए।

(दुनिया के बाशिंदे-२)

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

श्राप

अमावस्या की रात में
जंगलों में बसी आत्माएं
हवाओं के साथ तैरती
आसमान में खूब ऊपर पहुंचकर
ठहर जातीं हैं;
दुःख के साथ देखतीं हैं
धरती पर फैले हुए नासूर को
गन्दगी और दर्द से भरी नसें,
उनके ऊपर जमीं मवाद की
थोथी सुनहली स्फटिक;
व्याकुल हो फेर लेतीं हैं
अपने चेहरे

एक स्त्री का
ममतामय षट्कोणीय आनन पिण्ड
तैर आता है शहर की छत पर
डूब जाता बर्फीले शोर में
उसके रात से काले गेसुए
ढक देते
दरिद्रता के नग्न
स्तनों और पंगुता के अदृश्य
हाथों को
सुला देते
थके हारे कामगारों को
अपने आगोश में …

उसके बालों के छोर
गुदगुदाते होठों को,
खींच देते मुस्कराहट
निद्रालु शक़्लों पर

उसकी आँखों की मद्धम रोशनी
और श्वास की गर्मी में
भूल जाते हैं शहर को चलाने वाले
अपनी चिंताएं
खेलने लगते हैं अपने सपनों में
बचपन के खिलौनों की यादों से

अपने थरथराते पीले पड़ते होठों से
वो चूमती है
चौराहे की कठोर सतह,
ये कहते हुए कि,
"खूबसूरत हो तुम,
श्राप नहीं है तुम्हारा अस्तित्व।"

उसकी त्वचा को छूते हुए
बड़ी रफ़्तार से निकल जाती हैं
घबराई गाड़ियाँ

रविवार, 30 नवंबर 2014

सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त

मैं 22 साल का हूँ और बिल्कुल भी बुड्ढा नहीं हूँ, ये बात पहले ही नोट कर ली जाये। मैं सनकी हूँ और मेरे सिर में काफी सफ़ेद बाल हैं, ये सच है। पर मैं एकदम बांका नौजवान हूँ। आई याम अवेलेबल। 

"सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त।"
अबे सालों, पागल हो गए हो ? "सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त।" तुम्हारा भेजा ठिकाने से गायब है ?
"सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त।"
क्यों ड्रैकुला हैं पंजाब वाले ? और क्या केरल वाले सूर्य अस्त होने पर चिंता में पड़ जाते हैं ?
सूर्यअस्तपंजाबीमस्त। सूर्यअस्तपंजाबीमस्त। सूर्यअस्तपंजाबीमस्त। सूर्यअस्तपंजाबीमस्त।

एक बात बताओ पंजाब वालों तुम्हें इस गाने से घिन्न नहीं आती ? कोई इज्ज़त नहीं है तुम्हारी ? जो आया मिटटी पलीद कर गया। कोई सिर नहीं, पैर नहीं। अस्त-मस्त की अधजली तुकबंदी। सूर्य और पंजाबी में कोई रिश्ता नहीं। ये भी कह सकते हैं कि सूर्य अस्त, बंगाली मस्त। कुछ मेहनत-वेहनत की नहीं। स्क्रीन पर हिंगलिश में कर्सर घसीटा, दो आखर अपने मटर से दिमाग से निकाले, भेंस की टाँग, छिपकली की पूँछ, गाना तैयार। दिल्ली और चंडीगढ़ (हैदराबाद भी, साले हैदराबाद में भी नाच रहें हैं, वाह भारत माता वाह) के "रात्रि जीवन" जीने वाले युवाओं को मतलब थोड़ी है कि गाने के हिसाब से कौन मस्त हो रहा है और कौन अस्त।
सूर्य अस्त होने न होने से क्या होता है … जिसे मस्त रहना है वो हर वक़्त मस्त रहता है। बीकानेर में दोपहर दो बजे ठंडाई घुटती है और मोहल्ले के सारे बुढऊ पाटों पर जम ताश खेलते हैं और अर्थव्यवस्था के पतन से लेकर पोते की दस्तों तक का सारा इलज़ाम मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी पर लगाते हैं। (जब मै बीकानेर में था तब उनकी सरकार थी)
मैं ये नही कह रहा हूँ कि मेरे बचपन के समय फालतू गाने नहीं आते थे। उस वक़्त भी किसी मोहतरमा को किसी बंगले के पीछे वाली बेरी की छाँव में कांटा लग गया था तो चिल्लाने लगीं। और सारे भारत के नौजवानों के कान "ओड टू कांटा" सुनकर सतर्क हो गए। उस वक़्त ये बात काफी सामान्य लगी थी कि जो गाना सारे नौज़वानों को एक साथ रास आया है उसे तो बैन होना ही है। कांटा लगना विरह की चुभन को दर्शाता है। हमारा समाज उस चुभन को समझता है, उसे आश्रय देता है। पर इसका मतलब ये कतई नही था कि प्यार को भी आश्रय दिया जायेगा। इसलिए संभलकर, फूंक-फूंक कर पैर रखें और प्यार करें। अगर गलत व्यक्ति से प्यार कर लिया तो बदन की बोटी बोटी कर दी जाएगी।
पर अब तो टीवी ऑन किया और भांग पिए शिव-भक्तों की तरह नाचती लाइटें, अपने सीने का पसीना (सीने पे आया पसीना/मुझको तुमसे प्यार है हसीना… ये लो बन गया गाना) जीभ पर लगा कर सेक्सी दिखने वाले हीरो और उनके बगल में पहने हुए कपड़ों जितने ही कम भावों और चरित्र महत्ता वाली हीरोइन के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता। मुझे भी पार्टी पसंद है। "पॉट्टी करनी है पॉट्टी करेंगे, किसी के भी पप्पा से नी डरेंगे।" पर दिनभर सलाद खाने से ना, सलाद से नफरत हो जाती है। अरे रुको, सलाद से नफरत तो ऐसे ही हो जाती है। कोई बात नहीं।
तो इस प्रकार फिल्मे अब काँटों पर सस्ती तुकबन्दियाँ लिखने से बहुत आगे निकल चुकीं हैं। अब वे नाहिलिज्म के कुओं में उतर रहे हैं। कई बार तो इतने गहरे चले जाते हैं कि दिखाई देना ही बंद हो जाते हैं। वैसे भी चंडीगढ़ के किसी डिस्को में एक्सटेसी और कोकेन चढ़ाते युवाओं को कलाकार के दिल की इन अथाह गहराइयों से कोई मतलब तो है नहीं। आंटी पुलिस बुला लेंगी तो उनके पार्टनर हैंडल कर ही लेंगे। तो परवाह किस बात की।


मुझे लगता है कि मैं समय से पहले बूढा हो गया हूँ, सटक गया हूँ। मेरे आस पास विलायती बबूल उग रहें हैं। आई याम सेलेक्टिवली अवेलेबल।   

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

यज्ञ

सड़क किनारे एक बहरूपिया
इत्मीनान से सिगरेट सुलगाये
झाँक रहा है
अपनी कठौती में

चन्द्रमा की पीली पड़ी हुई परछाई
जल की लपटों के यज्ञ
में धू-धू कर जल रही है
रात के बादल धुंध के साथ मिलकर
छुपा लेते हैं तारों को
और नुकीले कोनो वाली इमारतों
से छलनी हो गया है
आसमान का मैला दामन
ठंडी हवा और भी भारी हो गयी है
निर्माण के हाहाकार से

उखाड़ दिया गया है
ईश्वरों को मानवता के केंद्र से
और अभिषेक किया जा रहा है
मर्त्यों का
विशाल भुजाओं वाले यन्त्र
विश्व का नक्शा बदल रहे हैं

उसके किले पर
तैमूर लंग ने धावा बोल दिया है
उस "इत्मीनान" के नीचे
लोहा पीटने की मशीनों की भाँति
संभावनाएं उछल कूद कर रहीं हैं
उत्पन्न कर रहीं हैं
मष्तिष्क को मथ देने वाला शोर

उसकी खोपड़ी से
चिंता और प्रलाप का मिश्रण बह चला है
और हिल रही हैं
आस्था की जड़ें

एक रंगविहीन परत के
दोनों और उबल रहा है
अथाह लावा

(नयी कविता लिखी ! )