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मंगलवार, 21 नवंबर 2017

कठोर

रेत और ठण्ड ने यहाँ की रातों के चेहरे
कठोर कर दिए हैं
उनमें धोरों की छाहें और बादलों की सलवटें हैं
उनकी आँखों में सितारों की साफ़-सुथरी झिलमिलाहट है
पथरीली राहों पर वो बिछातीं हैं प्रलय का शोर
और छोटे मोटे झरने
लबालब नदियों का खालीपन उनकी आँखों से बहता है
इस्पात के जंजाल में उनकी खनखनाती हँसी

अन्धकार में घिसटते विस्थापितों से विमुख वो
चाँद का दीर्घ निःश्वास छोड़तीं हैं
वो अपने शरणार्थियों
को पुचकार कर बुलातीं नहीं हैं
बस देखतीं रहतीं हैं भावहीन
जैसे कोई देखता है किसी रेल के जाने को
जिसमें उसे चढ़ना नहीं है

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

धुर


किसी मुटाए हुए आदमी की अनामिका में पहनी
अंगूठी सी तुम
हतप्रभ समय-शंकु पर नकेल की तरह आरूढ़
भूतकाल की सारी घटनाएँ सिमट-गुँथकर
आतीं हैं तुम तक
और सारे संभावित भविष्य
तुमसे उत्प्रेरित
तुम्हारे होने से लक्षित
देश-काल का सुलझ जाना रिक्त व्योम में
आप्लावित इन्द्रियों के मुड़े-तुड़े बड़बड़ बिम्ब

तुम्हारा होना जैसे
ब्रह्मा की मृत्यु

गुरुवार, 15 जून 2017

चन्द्रकला: बारिश

आंधी के झकझोरे पेड़
ने झाड़ दी
घंटों से संजोई बारिश
भिगो दिया मुझे
जैसे, चन्द्रकला, तुम
फट पड़ती हो खिलखिलाहट से
मेरा कोई उद्दंड मज़ाक सुनकर
बरसा देती हो सैकड़ों थपकियाँ

जैसे थपथपाकर मेरी दादी माँ
बाजरे की लोई को
बदल देती हैं
नम सतह वाली चपटी रोटी में
वैसे ही चलता हूँ मैं तुम्हारी बगल में
स्वेद-अच्छादित
अवाक्,
मुस्काता बेढ़ब

सोमवार, 18 जुलाई 2016

समां



कृषि मंडी के दरवाजे पर
चेचाणी जी का पग पड़ गया
बिल्ली की टट्टी पर
गुस्से के मारे उन्होंने अपने करम को गलियाँ दीं
आज नहीं निहार पाएंगे वो
घर के रास्ते पर
शाम की छाँव में लहराते पेड़
और सड़क के दोनों किनारों पर
अभ्रक की चमक

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

मेरी कविता "शाप" का वीडियो




मेरी 58 कविताओं का संग्रह "अन्धकार के धागे" हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित किया गया है. यदि आपको यह कविता पसंद आती है तो इंफीबीम से संकलन की प्रति अवश्य आर्डर करें.


यहाँ में संकलन में से एक कविता, 'शाप' पढ़ रहा हूँ, गौर करें.

रविवार, 21 जून 2015

जूतमपैजार

पसीने से तरबतर
दढ़ियल दद्दा ने
अपने घिसे फ्रेम और मोटे लेंस वाले चश्मे को
नीले- सलेटी चैक्स छपी लुंगी पर साफ़ किया
और नए-नवेले अंधड़ में से
सड़क के पार देखा
इमारतों पर जमी धूल की चद्दरें बदल दी गयीं हैं
झाड़ दिए गए हैं पेड़ों के लिबास
हवाएं फटे गले से घोषणा करती हैं
वर्षा के आगमन की

वर्षों से जारी हानिकारक ज़र्दे के सेवन से
भूरे-कत्थई पड़े दांतों पर उन्होंने
जीभ फिराई और
नमक, पानी और धूल का मिश्रण
सड़क के किनारे थूक दिया

बारिश की जूतमपैजार के समक्ष उन्होंने अपना
झुर्रियों भरा चेहरा पेश कर दिया;
किसी कारण से उन्होंने
अपनी नवजात पोती को याद किया
जिसने चलाये थे उनके चेहरे पर
नन्ही लातें और घूंसे
और मूत्र की गर्म धार

(बुढ़ापा-)

रविवार, 31 मई 2015

बचपन ५-८

खेल
चाँदनी के उजास में
झिलमिलाती झील के किनारे
पसरे उजाड़ में
एक छोटा लड़का और एक छोटी लड़की
एक विशाल नारंगी गेंद से
खेल रहे थे;
वो सूर्य था।

स्पीड ब्रेकर
बचपन के मैदानों से निकलकर
छोटी सी छोकरी
प्यार की ढलानों पर 
उत्साह से साईकिल दौड़ा रही थी।
रास्ते में बाँध सा ऊँचा
स्पीड ब्रेकर आया …
साईकिल उछली, लड़की सड़क किनारे खड़े
अचंभित से खम्भे के आधार पर
मुँह के बल गिरी
ठुड्डी फूट गयी, रक्त बह चला।

आधिपत्य
एक गज बाई एक गज की जमीन पर
हमने अपना आधिपत्य घोषित किया
इमारतें, रेलवे स्टेशन, खेत, टंकियाँ,
सड़कें, कीचड़, टेबलें, कुर्सियाँ,
सपने, मिटटी और चुम्बन
इन सबको लेकर शहर बनाया
भीड़ और प्रदूषण से मुक्त
रीसाइकलेबल शहर
आदर्श शहर
दो सींकें गाड़कर कागज़ से स्वागत द्वार बनाया
उसपर लिखा "कॉपीराईट © ऑल राईट्स रिज़र्व्ड"

उत्सव 
कंकड़ पत्थरों से भरे
एक उबड़ खाबड़ मैदान को मैंने
समतल बनाया
और बहत्तर-बीसी कविताएँ
बड़ी नज़ाकत से बिछा दीं

आसमान से देवताओं की जमात
ताली बजाते हुए उतरी;
मेरी कविताओं पर कूद-कूद कर
एक-एक की मिट्टी पलीद कर दी।

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

बचपन : १-४

१.
मामाजी 
सूरज की बची-खुची चमक को
आसमान ने घोंट दिया
अपने सलेटी लबादे में,
ओढ़ा दिया अँधेरा
छटपटाते हुए
गांवों, जंगलों और पहाड़ों को --
और डपटकर बोला,
"चुप्प करके सो जाओ अब,
एकदम चुप्प!"

२.
नहानघर
मूसलाधार वर्षा की हिंसा
के समक्ष घुटने टेक दिए
मिट्टी के घरोंदों और पुतलों ने,
शिलाचूर्ण का समाज बह गया
अपने ही दुराग्रह में
परत-दर-परत;

आवाज़ों के विस्तृत सिंचित भूभाग
की मिट्टी के हर दाने से
फट पड़ीं कोंपलें,
निकल पड़े काँटे।

३.
अकाल 
प्रेमबाई के घर के पिछवाड़े में
एक तालाब हुआ करता था
जो अब सामुदायिक टट्टीघर है।

कभी उस तालाब ने
मानसून के जोश में उफन कर
बहा दिया था कस्बे के एकमात्र सिनेमा हॉल को।
पाल की मिट्टी को झाड़ियों की जड़ों से काट
वह भाग निकला।
पीछे छोड़ गया
उघड़ी, फटेहाल धरती,
और हरा, काई भरा रुदन करते पेड़।

४.
डाम 
पुराने अस्पताल की पीली पुती
दीवारों पर
शनैः-शनैः काई की ज़िल्द चढ़ रही थी।
गगनचुम्बी नीम के पेड़ों से
हवा के चिड़चिड़े झोंकों के साथ
झड़ जाते कबूतरों के सैलाब
और पीली पत्तियों के झुण्ड…

पानी के छोटे से तालाब में छप-छप करना
बंद करके हमने निश्चय किया
पकड़नी ताली खेलने का।
सबकी हथेलियाँ नीचे की ओर थीं, मेरी ऊपर की ओर…
दूर से मम्मी अर्जुन की भांति जूता ताने दौड़ी आ रही थी,
डाम। 

रविवार, 18 जनवरी 2015

मुस्कुराहट

सवेरे के परदों
ने दिन को रास्ता दिया
और सूरज की रोशनी
धड़धड़ाती हुई उतर आई
टेबल से फर्श पर

दातुन, साबुन और किताबें गर्माहट पाकर
खुश से हो गए
परदे बाहर वाले पेड़ की पत्तियों
की भाँति
मचलना बंद कर चुके

ननिहाल के
गोबर नीपे फर्श पर बने
मांडणों सी
पारदर्शी, गोलमटोल आकृतियाँ
क्रीड़ाएँ करने लगीं
दृष्टिपटल पर

सुग्गों का एक जोड़ा
पिंजड़े का दरवाजा खुला पाकर
बिना मुझे साथ लिए ही
फट्ट-फट्ट कर उड़ गया

बलिश्त भर मुस्कुराहट
ताज सी आ बैठी उसकी
ठुड्डी पर
झड़ गए दो दर्ज़न सितारे
प्यार के मारे
दिन दहाड़े ही

(प्यार-३)

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

श्राप

अमावस्या की रात में
जंगलों में बसी आत्माएं
हवाओं के साथ तैरती
आसमान में खूब ऊपर पहुंचकर
ठहर जातीं हैं;
दुःख के साथ देखतीं हैं
धरती पर फैले हुए नासूर को
गन्दगी और दर्द से भरी नसें,
उनके ऊपर जमीं मवाद की
थोथी सुनहली स्फटिक;
व्याकुल हो फेर लेतीं हैं
अपने चेहरे

एक स्त्री का
ममतामय षट्कोणीय आनन पिण्ड
तैर आता है शहर की छत पर
डूब जाता बर्फीले शोर में
उसके रात से काले गेसुए
ढक देते
दरिद्रता के नग्न
स्तनों और पंगुता के अदृश्य
हाथों को
सुला देते
थके हारे कामगारों को
अपने आगोश में …

उसके बालों के छोर
गुदगुदाते होठों को,
खींच देते मुस्कराहट
निद्रालु शक़्लों पर

उसकी आँखों की मद्धम रोशनी
और श्वास की गर्मी में
भूल जाते हैं शहर को चलाने वाले
अपनी चिंताएं
खेलने लगते हैं अपने सपनों में
बचपन के खिलौनों की यादों से

अपने थरथराते पीले पड़ते होठों से
वो चूमती है
चौराहे की कठोर सतह,
ये कहते हुए कि,
"खूबसूरत हो तुम,
श्राप नहीं है तुम्हारा अस्तित्व।"

उसकी त्वचा को छूते हुए
बड़ी रफ़्तार से निकल जाती हैं
घबराई गाड़ियाँ

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

रात

तालाब के गीले कोनो पर
ज़िन्दगी की जेबों में
सिमट कर बैठे हैं
गुलदस्ते
अपने घर मिटटी में डुबोए
इस इंतज़ार में कि
अनिर्वचनीय गंध वाली
अँधेरे की एक लट उन्हें प्यार
कर जाएगी
बयार सा ठंडा दामन
सहला जायेगा उन्हें
हंसी की सलवटों से लदी
नाक सा नन्हा चाँद
नहला देगा चांदनी से
उनकी खट्टी उँगलियों को

वो रात है स्वयं,
उसके हाथों से बने सीप से आवरण में सूरज
औंधे मुँह सोया है
सधे हुए नंगे कदमों से
सूखे पत्तों से लदी राह पर
वो रखती है ओस के मोती
सवेरे की दूब पर,
बढ़ती है पश्चिम की ओर
छिड़कते हुए
अल्हड़ मुस्कान का प्रभात

वो चलती है पानी पर यों
जैसे तैरते हैं बादल
पर्वत श्रृंखला के सहारे-सहारे

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

रुको … सुनो !

तुम घूमती हो व्याकुल हो कर
मेरे ह्रदय में, सदा छलते शिकार के पीछे
मैं अपनी क्षुधा, अपनी व्यथा
रात्रि के गले में उंडेलता हूँ

एक गूँज लौट कर आती है
और बहा ले जाती है मुझे
मैं विलाप करता हूँ, उष्म-बिम्ब !
तुम्हारे लिए

भय के मेंढकों की टर्र-टर्र
आभास कराती है, बाघिन के आगमन का
सचेत हो गए हैं कांटे और झाड़ियाँ
पर तुम अविचलित निकल गयीं मेरी
नाटकीय बक बक से
बिना मलिन हुए, बिना उत्तेजित हुए

मैं भूल रहा हूँ
सूत्रों और मन्त्रों की दुनिया को,
मेरे जेहन से मिट गए हैं
कवि , सियार और लकड़बग्घे
अविश्वास भरी आँखों से क्या देख रही हो मेरी तरफ ?
क्या अभी महसूस हुई है मेरी चेतना ?
मैं जंगल हूँ प्राणेश्वरी…
और मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।

(प्यार-१)

On Rain and Thunder

बटेउ ओ केरो खडको 
चाल्यो बरखा रो चरखो 

गोबर अर फूस सुं ढंकी गलियां 
में भर बह्यो गन्दळो जळ 
नगरी रे ढसते परकोटे पर 
फट पड़ी है पीपळ री कोम्पळ 

थार री माटी रा कण 
नाचे है धोरा री चोटी पर 
आभा घुमड़े रे
नथुना में सौरम माटी री भर
आज तो सड़पांला
तीखी बूंदा रा झोलां में

नयोड़ी छतरी ने परखो
चाल्यो बरखा रो चरखो