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गुरुवार, 15 जून 2017

चन्द्रकला: बारिश

आंधी के झकझोरे पेड़
ने झाड़ दी
घंटों से संजोई बारिश
भिगो दिया मुझे
जैसे, चन्द्रकला, तुम
फट पड़ती हो खिलखिलाहट से
मेरा कोई उद्दंड मज़ाक सुनकर
बरसा देती हो सैकड़ों थपकियाँ

जैसे थपथपाकर मेरी दादी माँ
बाजरे की लोई को
बदल देती हैं
नम सतह वाली चपटी रोटी में
वैसे ही चलता हूँ मैं तुम्हारी बगल में
स्वेद-अच्छादित
अवाक्,
मुस्काता बेढ़ब

बुधवार, 10 मई 2017

उखड़

दीवार-सी कठोर उसकी पीठ पर ठुकी कीलें हिल गयीं
रेशे तैर आए हरे गाढे द्रव के
काई से ढके, मच्छरों से तरबतर
सुगबुगे दलदली तालाब बन गए उसकी आँखों के चारों ओर
धँसती गयी उसकी जड़ें
किसी पुरानी गली में
ले आई है उसकी खोज उसे
कूदते-फाँदते, घिसटते-लटकते
उसकी साड़ी में छेद हो गए हैं
और मति में स्मृतिभ्रंश
अवाक्, उसने सर उठाया
दूर किसी बुड्ढे की खाँसी की भांति
सूने घर की काल्पनिक सांय सांय ने
झकझोरा उसे
पहेली सी गूँजती भाषा में

इसी डूब में कहीं आस पास उसका घर था
जिसके कोनों में उसके भय बसते थे
खेजड़ी के काँटों की तरह जो
रक्षा करते थे रह्स्यों की
जिनको नंगा कर देना था उसे हाड़ा रानी की तलवार से
जहाँ गुसलखाने में फिसल कर उसके नितम्ब का जोड़ हिल गया
दुविधाओं के वक़्त उस चोट की कसक लौट आती अचानक ही
जहाँ घट्टी की गरड़-गरड़ में पहाड़ों का रट्टा भुला जाता था
उनकी जगह आ बैठती थीं
विसंगतियों से लदीं कहानियां
जिसकी पानी की मोटर हेडीज़ की तरह भूतों को कुओं
से निकाल कर धूप में लेटा देती थी
उनकी संतुष्टि भरी आहों से उसके नथुने बेचैन हो उठते थे

उसके घुटनों में दर्द है
पर नितम्ब में कोई कसक नहीं
वो भौचक है कि कैसे कहानियों की डोरियाँ ले आयीं उसे
इधर
जहाँ से वो भागी थी भीगी, अधूरी बुनावटें लेकर
अरबों टिड्डे टकराए थे उसकी पीठ से
एक पत्ती भी साबुत नहीं बची
वहाँ धरती की नसों ने जमा कर दिया है
खालीपन का पीब
और अजनबीयत
ये उसका देश नहीं है
पर ये जगह उसकी है।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

चेहरा

आसमान और जमीन के दैनिक कार्यक्रम में
कुचले हुए ऐसे कुछ क्षण होंगे
जब तुम्हें ज़्यादातर चीज़ें याद नहीं रहेंगी

तुम्हें याद नहीं रहेगा कि उस दिन क्या वार था
स्कूल में क्या पढ़ाया था
कोहनी पर कहाँ चोट आई थी
किसने बाग़ से खदेड़ कर भगाया था
या कौनसी सब्जी बनी थी

तुम भूल जाओगे कि
उस दिन टीचर ने खींचकर तमाचा मारा था
और कक्षा के छुट्टे सांडों ने मैदान में खूब दौड़ाया था
तुम भूल जाओगे
कि तुम्हारी गोद में बैठे मासूम पिल्लों की माँ
से तुम मुश्किल से जान बचाकर भागे थे
और अस्पताल के पिछवाड़े में पड़ी गन्दगी में तुम भागे  थे
एक अदना डाम बचने की ख़ातिर

पर उसी उहापोह में कहीं
मम्मी ने अपनी बनी अधहरी-अधखरी स्वेटर
तुम्हारे बालों में फसे तमाम ताम-झाम को
हटा कर फँसा दी तुम्हारे गले में
और इस अनुक्रम के बाद दोनों कन्धों को झंझोड़ दिया
हलके से
उस घर्षण से पैदा हुई गर्मी को गले से लगाए
तुम पोपली हंसी हंसोगे अपनी खाट में पड़े
कहीं दूर भविष्य में
कभी नहीं भूलोगे
हरे जालीदार अँधेरे में जद्दोज़हद करना और
अंततः गुफा के प्रकाशित अंत पर पाना
मम्मी का प्यार से लदा चेहरा

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

बचपन : १-४

१.
मामाजी 
सूरज की बची-खुची चमक को
आसमान ने घोंट दिया
अपने सलेटी लबादे में,
ओढ़ा दिया अँधेरा
छटपटाते हुए
गांवों, जंगलों और पहाड़ों को --
और डपटकर बोला,
"चुप्प करके सो जाओ अब,
एकदम चुप्प!"

२.
नहानघर
मूसलाधार वर्षा की हिंसा
के समक्ष घुटने टेक दिए
मिट्टी के घरोंदों और पुतलों ने,
शिलाचूर्ण का समाज बह गया
अपने ही दुराग्रह में
परत-दर-परत;

आवाज़ों के विस्तृत सिंचित भूभाग
की मिट्टी के हर दाने से
फट पड़ीं कोंपलें,
निकल पड़े काँटे।

३.
अकाल 
प्रेमबाई के घर के पिछवाड़े में
एक तालाब हुआ करता था
जो अब सामुदायिक टट्टीघर है।

कभी उस तालाब ने
मानसून के जोश में उफन कर
बहा दिया था कस्बे के एकमात्र सिनेमा हॉल को।
पाल की मिट्टी को झाड़ियों की जड़ों से काट
वह भाग निकला।
पीछे छोड़ गया
उघड़ी, फटेहाल धरती,
और हरा, काई भरा रुदन करते पेड़।

४.
डाम 
पुराने अस्पताल की पीली पुती
दीवारों पर
शनैः-शनैः काई की ज़िल्द चढ़ रही थी।
गगनचुम्बी नीम के पेड़ों से
हवा के चिड़चिड़े झोंकों के साथ
झड़ जाते कबूतरों के सैलाब
और पीली पत्तियों के झुण्ड…

पानी के छोटे से तालाब में छप-छप करना
बंद करके हमने निश्चय किया
पकड़नी ताली खेलने का।
सबकी हथेलियाँ नीचे की ओर थीं, मेरी ऊपर की ओर…
दूर से मम्मी अर्जुन की भांति जूता ताने दौड़ी आ रही थी,
डाम। 

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

रात

तालाब के गीले कोनो पर
ज़िन्दगी की जेबों में
सिमट कर बैठे हैं
गुलदस्ते
अपने घर मिटटी में डुबोए
इस इंतज़ार में कि
अनिर्वचनीय गंध वाली
अँधेरे की एक लट उन्हें प्यार
कर जाएगी
बयार सा ठंडा दामन
सहला जायेगा उन्हें
हंसी की सलवटों से लदी
नाक सा नन्हा चाँद
नहला देगा चांदनी से
उनकी खट्टी उँगलियों को

वो रात है स्वयं,
उसके हाथों से बने सीप से आवरण में सूरज
औंधे मुँह सोया है
सधे हुए नंगे कदमों से
सूखे पत्तों से लदी राह पर
वो रखती है ओस के मोती
सवेरे की दूब पर,
बढ़ती है पश्चिम की ओर
छिड़कते हुए
अल्हड़ मुस्कान का प्रभात

वो चलती है पानी पर यों
जैसे तैरते हैं बादल
पर्वत श्रृंखला के सहारे-सहारे

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

ईश्वर एक उपमा है।

राजपथ के किनारे
रात के बादलों से घिरी
एक लड़की को
हवाएं चूमती हैं
और कपडे सहलाते हैं
पर वह खूबसूरत महसूस नहीं करती ,
घसीटती हुई चलती है
अपने पैरों को
कंकरीली धरती पर
दिशाओं में कुत्ते गुर्राते हैं
और फुफकारते हैं नीम के पेड़

प्यार और गोलियाँ ,
वर्षा और विघटन
गले मिलते हैं

दीर्घ उच्छ्श्वास ,
उत्तेजित रोम ,
आत्मविश्वास।
उरोज ठोड़ी की ओर बढ़ते हैं ,
भोंहे कानों की ओर

अस्तित्व के फूल खिलते हैं
एक बार फिर
यकायक भान हुआ है
त्वचा को स्पर्श का
दृष्टि को उपस्थिति का
समाप्त हो गयी है प्रलय
उदय हुआ है आह्लाद का।

उधर तूफानों के परे
आसमान में कहीं
एक ईश्वर
उत्सव और समृद्धि के ढेर में बैठा
देखता है इस सूक्ष्म ,
नगण्य जीवन को
परिवर्तित होते
नापता है उसे अपनी हथेली
की तुलना में
व्यंग्य भरी हंसी हँसता है
द्रुत निश्वास के साथ

बड़ा गर्व है उसे ,
अपनी विशालता पर ,
शक्ति पर ,
त्रिगुणातीत होने पर …

ईश्वर मूर्ख है ,
ईश्वर विपन्न है ,
ईश्वर अपूर्ण है।

ईश्वर एक उपमा है।