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सोमवार, 18 मार्च 2024

दिशासूचक

१.


जैसे बहुत सारे पतले-पतले तार 

एक साथ मरोड़े गए हों 

वैसे गुंथी सी लकीरें 

कई गाड़ियों की बत्तियाँ

पल भर के लिए प्रवाह के गुच्छ से बाहर आकर 

पुनः लौट जाती हैं प्रवाह में 

कुछ देर तक तुमने सोचा होगा कि हाइवे छोड़कर 

मुड़ लिया जाए गली में

ओझल हो जाया जाए इस झमेले से 

फिर घबराकर मोड़ लिया 

स्टीयरिंग फिर से 

ठीक प्रवाह के केंद्र की ओर  

और बढ़ चले समाज की गर्दन की ओर पुनः 


मैप्स के वैकल्पिक पथ सुझावों ने भी चुप्पी साध ली है 

गोया कि गहन चिंतन मनन 

का दारोमदार उठाया हो 


चुम्बक सा खींचता प्रवाह 

निषिद्ध करता है ठीक से साँस लेना 

लहरों के बीच के बुलबुले काफी होने चाहिए 

आख़िर संचय शक्ति का, है ज़रूरी 

किसी बाँध, किसी सिग्नल पर काम आवेगा 

अभी बगल में दौड़ती किसी गाड़ी से 

तुम्हारा क्या ही लेना-देना है 


पर प्रवाह की गति अब मंथर हो चली है 

सब इन्द्रियाँ व्यस्त है अब 

स्टीयरिंग पर हाथ कस गए हैं 

कुछ पुलिस वाले लट्ठ लिए 

ऐसे दिखना चाहते हैं जैसे हांक रहें हो एक तालाब को 

अचानक तुम्हें क्रोध आता है 

दौड़ कर सड़क पार करती एक महिला पर 

तुम पहचान सकते हो विकृत भृकुटियाँ 

अगल-बगल के शीशों के पीछे

अंततः दबा ही देना होगा 

ब्रेक


२.


हर मिनट लेन बदलते, गरियाते, भोंपू बजाते 

कुछ हज़ार ड्राईवर 

पच्चीस मीटर बाई पच्चीस मीटर में 

इकट्ठे हुए 

नफासत से सटे, पैक होकर 

बेतरतीब दिशासूचक बने बिखरे हैं 

शहर की धमनी में एक विशालकाय थक्के की भांति


तुम्हारे कपाल की नसें गांठों में कसमसा रहीं हैं 

तुम्हारे पेट गुड़गुड़ाते हैं भूख से तिलमिलाते 

माथे की सलवटों पर इस्तरी सी करते

कारों के बीच से सड़क पार करने का रास्ता ढूंढते लोगों

की जान बख्शते

तुम 


ट्रैफिक सिखाता है तुन्हें सोचने की तमीज़

या बद-तमीज़, पक्के से कहना मुश्किल है 

जहाँ समस्याओं की जड़ तक पहुँच कर 

मुर्गियों और अण्डों की बहस में तुम नहीं पड़ते 

बस मान लेते हो कि 

तुम्हारी कार की चहारदीवारी 

विभाजन रेखा है प्रकृति और पुरुष की 

परस्पर गुंथे तार शायद बाँट लेते हो कुछ इलेक्ट्रान 

पर उनके बीच लगभग तिकोनी घाटियों में भरी हवा 

काफी है कहने को कि 

"माइंड योर ओन बिझनस"


कि मानवता-मानवता खेलना अच्छी बात है 

पर प्रेम की पींगें तुम अपने मोहल्ले में घुस कर बढ़ाना 

तुम्हारे खिलखिलाते भंवर 

तुम्हारे ट्रांस-ह्यूमन सरोकार 

परे धरो 

और ये देखो कि गला फाड़ कर चिल्लाते 

बड़बोले की गाड़ी तुमसे कितनी समानांतर है

दिशासूचकों के अवकलन-समाकलन में 

तुम्हारे सलामत निकलने की कितनी सम्भावना है 

किस तरफ़ बन्दर घुड़कियाँ 

और किस तरफ़ साझा झल्लाहट भेजी जानी है 

कि बत्ती हरी हो 

और तुम ऐसा एक्सेलरेटर दबाओ

रुको फिर 

अपने अंतर्मन में जाकर ही 

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

चुप्प चीख

 

थरथराते हुए

बॉल पेन का

गोल गुल चलने लगता है 

मलेरिया बुखार सा 

एक क्षण रफ़्तार से

फिर अवरोह में मंथर

गहरे गड्ढे में गिरने से ख़ुद को रोकता 


कोई सांड 

लकड़ी के दरवाज़े पर बार-बार 

सिर मारता है 

दरवाज़ा पसीने से लथपथ, चरमराता है 

फिर धीमे से साँस लेता 

अपनी जगह वापस आता है 

अपने जीवन के बचे खुचे क्षण गिनता 


फिर

वो दहाड़ कर टूटता है

अँधेरी गहराइयों में उसके

परखच्चे उड़ जाते हैं


परखच्चे उड़ जाते हैं

पन्नों के, जिल्द के

गुल खुरचता है खाली पन्नों को इतना

ऊपर नीचे दाएं-बाएं

किसी चीख की अवशिष्ट तरंग सा


नीचे, जमीन हो जाती है तितर-बितर

क्षीण हो जाता है एक ग्रह का केंद्र

और

बॉलपेन झल्लाता घिसटता रहता है

अँधेरी, रिक्त दिशाओं में

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

अभी पढ़ा: राजेन्द्र यादव का उपन्यास "सारा आकाश"

 किताब यहाँ खरीदें
(यदि आपने "सारा आकाश" नहीं पढ़ा है तो इस आर्टिकल को न पढ़ें. spoilers ahead.)
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पता नहीं अज्ञेय को ऐसा क्यों लगा कि इस उपन्यास के प्रारंभिक और अंतिम हिस्से आवश्यक नहीं थे और एकबारगी राजेंद्र यादव ने उनकी बात मान भी ली. धर्मांध लोगों के आतंरिक अंधेपन का सती-भक्त हुज़ूमी उन्माद बनना तो सबसे बेहतरीन अंत है. शायद अज्ञेय उन लोगों में से थे जिन्हें वाकई में भारतीयों के अंतर्मुखी होने पर गर्व हुआ करता है. और फिर यह कोई अनूठे शिल्प वाला, अक्लमंद उपन्यास तो है नहीं. अपने समय की एक भयावह समस्या को जड़ से नेरेट करता हुआ उपन्यास है. अगर मैं इसका झकझोर देने वाला अंत न पढता तो शायद इस किताब का मुझपर उतना गहरा असर न होता.

कहानी का मुख्य पात्र निहायत जाहिल और आसानी से बह जाने वाला आदमी है जिसके मन के विचार बस औरों की कही बातों की प्रतिध्वनि भर है. सामाजिक-राजनैतिक बहस का आदर्श मस्तिष्कहीन कड़ाह, जिसमें किसी नए विचार के लिए सम्मान "ये तो मैंने सोचा ही नहीं" के रूप में कौंधता है. फिरकापरस्ती कि तालीम लेते "राह भटके युवक" के लिए वह एक आदर्श स्कैफोल्ड होता है, पर डिप्रेशन के मारे आत्महन्ता को दया करके थोड़ा और बुद्धिमान बना देना चाहिए. वैसे हिन्दू फिरकापरस्तों के लिए "राह भटके युवक" वाली कहानी की बहुत ज़रूरत है. हिन्दू आतंकवादियों (अभी जो पालने में पैर दिखा रहे हैं) को बस एक संगठन की छाया बनाकर दिखा दिया जाता है; उनको समझने की आवश्यकता किसी को महसूस नहीं होती (मैंने बहुत सारी किताबें नहीं पढ़ीं है. यदि आपकी नज़र में कोई हो तो ज़रूर बताएं).

खैर, अब टिन के डब्बे की तरह पराये विचारों को गड़गड़ाते इस मूरख नारसिसिस्ट को सुनते सुनते, उपन्यास के अंत तक आते आते आदमी के कान थकने लगते हैं. शिरीष. नायक के कड़ाह में तलते विचारों का एकमात्र स्रोत (हमारे देश के बुद्धिजीवियों के विचार में समाज का अकेला औथोराईज्ड स्रोत). अगर उसकी जगह प्रवीण तोगड़िया होता तो हमारा नायक त्रिपुंड लगा, खड्ग लिए भी निकल पड़ता. उसके इम्पल्स का नतीज़ा बेचारी प्रभा भुगतती रहती है. तब समर का अपने आपको यह प्रश्न पूछना अच्छा लगता है कि क्या वो वाकई में प्रभा से प्रेम करता है? हालाँकि, वो प्रश्न भी उसके दिमाग में किसी और ने ही डाला है.

पर फिर मुन्नी और प्रभा के चरित्रों की तकलीफें उतनी ही ज़्यादा प्रभावित करतीं हैं क्योंकि उनका गला समाज तो घोट ही रहा है, उपन्यास ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. मेरे विचार में यह जान-बूझकर किया गया है और उपन्यास का वह तत्व है जो इसे एक अच्छी और ज़रूरी किताब की श्रेणी में ला रखता है. प्रेत बना नायक, पुलिस, अनमने श्रद्धालू और खिडकियों से झांकती सहमी औरतें. हमारा समाज सचमुच इनेक्शन का मारा था. लोग अन्याय के खिलाफ दंगे के भय से नहीं बोलते थे. आज के जमाने की स्त्रियाँ तो लिंगभेद के ऐसे स्पष्ट आचरण कि ईंट से ईंट बजा डालें. हालाँकि, वो प्रवृति आज मैं हिन्दू-मुसलमान के मामले में देखता हूँ.

यह बहुत सच बात है कि हमारा समाज अतीतजीवी और पलायनवादी है पर यह भी सनद रहे कि भारत के प्राचीन विज्ञान को ग्रीक और इजिप्शियन समाज के योगदानों जैसा सम्मान कभी नहीं मिला है. बात वहीँ आ जाती है कि आखिर लट्ठ के दम पर किसको कभी सम्मान मिला है!

शायद यही बेस्ट सेलर मटेरियल होता है -- जो कि किसी भी भाषा के साहित्य का बहुत जरूरी हिस्सा है, और हमने इसे खो दिया है. अगर आप इस प्रकार के आम अपील वाले कथानकों को प्रकाशित नहीं करेंगे तो उनकी जगह गुलशन नंदा जैसे लोग ले लेंगे. पॉप सेंसिबिलिटी को चित्रित करते लेखकों को मेरा पूरा समर्थन प्राप्त है.

राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी को बराबर महत्वपूर्ण आँका जाता है -- जिससे मैं असहमत हूँ क्योंकि मन्नू भंडारी के कथानकों और चरित्रों में जो गहराई और निशब्द विस्तार होता है, राजेंद्र यादव के इस उपन्यास में तो नहीं है. अब अगर कोई कहता है कि मन्नू भंडारी का लेखन जनमानस की सशक्त अभिव्यक्ति नहीं है तो भैया, हमारे लिए तो ढंग से चित्रित फूल-पत्ती ही अच्छी. अंतरिक्ष के अँधेरे में चमकता नीला पिक्सलेटेड बिंदु किसने देखा है (जुमला Zakir Khan का है).

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

अभी पढ़ा: पानू खोलिया का उपन्यास "वाहन"

बचपन में पानू खोलिया की एक कहानी पढ़ी थी, “प्रतिशोध”.
लगभग प्रलाप से भरी, एक बच्चे में मन की कहानी. शायद इसलिए उनके उपन्यास “वाहन” से मुझे कुछ अलग उम्मीद थी. (यहाँ खरीदें)

पर ये एक पुराने तरीके की किताब है, अपनी एक विशेष संरचना के बावज़ूद. पानू खोलिया का यह पूरा नावेल मुख्य किरदार “बाबूजी” के इर्द गिर्द घूमता है. हालांकि, लेखक परिप्रेक्ष्य को कथानक की ज़रूरत के मुताबिक बदलते रहते हैं. प्रेमचंद की तरह ही, सभी पात्रों के विचार एक अदृश्य, सर्वज्ञ नैरेटर हमें बताता रहता है. बाबूजी पुराने विचारों वाले आदमी हैं और अपने ठोस रूढ़िवादी विचारों को बदलते नहीं है, उनका बाहरी हुलिया बदलते जमाने के साथ भले ही बदलता जाय. एक तरह से वो हमारे समाज के द्योतक हैं जो पाश्चात्य संस्कृति से व्यापार करने के लिए दिखने मात्र के लिए तो मॉडर्न हो गया है पर उसके ठोस रूढ़िवाद जस के तस बने हुए हैं.

(यदि आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है तो यहाँ से आगे न पढ़ें. spoilers ahead.)

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बाबूजी बड़े निर्दयी इंसान हैं. अपनी पत्नी को वो अपने घर का नहीं मानते, बुढापे में भी. अपने बच्चों को किसी इन्वेस्टमेंट की तरह बड़ा करते हैं, जाहिर है कि ये सिर्फ मर्दों पर लागू होता है. बेटियाँ ब्याहने की जिम्मेदारी है सो निपटा देनी है. न वो हमारी हुईं, न सामने वाले की हुई ठहरीं. शेष सब उनके लिए शतरंज के मोहरे हैं, कमज़ोर निकले तो फेंक दिए जाएँगे, मज़बूत निकले तो सर पर बिठाए जाएँगे. विपक्ष वाले मोहरे एक हिंसा के साथ नष्ट कर दिए जाएँगे. कोफ़्त होती है पढ़कर. पक्का ईविल पैट्रिआर्क.
पर फिर भी उनके सीधे सादे परिप्रेक्ष्य से सहानुभूति रहती है और उनकी बढती औकात पर ख़ुशी. पानू खोलिया का प्रलाप भरा तरीका कहीं न कहीं तो घुस ही आता है और बाबूजी को दिल के करीब ले आता है. और इसी वजह से मृत्यु के दिन-ब-दिन करीब होते बाबूजी जब अपने पूरे जीवन को फिर से सोचते हैं और अपनी कठोरता और धूर्तता पर पछतावा करते हैं तो उनके पैट्रिआर्क के नीचे गहरे दबे इंसान से सहानुभूति होती है.
(spoiler section ends)

आज के समय में ये उपन्यास मेरे जैसे लोगों को इसलिए रिलेवेंट नहीं लगता क्यूंकि मुझे लगता है कि हम उस प्रकार के लोगों को पीछे छोड़ आये हैं और ज़माना बदल गया है (जैसा सब प्रेमचंद को पढ़कर कहते हैं), पर क्या सचमुच? ख़बरें पढ़ कर तो नहीं लगता. हो सकता है पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में भूले हम लोगों ने उस पीढ़ी की और बस आँखें मूँद लीं. अब जब वो पूरी हिंसा के साथ डंडे लिए अंधेरों से निकल कर आते हैं तो हम ये सोचते हैं कि कोई ऐसा कैसे हो सकता है. हम वैश्वीकरण की बाढ़ में बहकर अपने लेखों में, कला में, विज्ञान में – भूतकाल के एक पूरे पैराग्राफ को दफना चुके और उसके भूतों से बात करने का माद्दा हममें रहा नहीं. नए लेखकों के परिप्रेक्ष्य से भी ऐसे “मिथकीय” से लगने वाले लोगों को समझने की ज़रूरत है. शायद उससे हमारा साहित्य जनमानस के ज्यादा पास आ सके. 

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

विघ्न

तुम कूद पड़े
हज़ारों उफनते नागों के मध्य

तुम्हारी प्रदूषित फुफकारों ने,
तुम्हारी दहाड़ती कदमताल ने
रोएँ खड़े कर दिए चट्टानों के
मिटा दीं पानियों की यादें
अब वो बहते नहीं हाथियों के गालों पर
जब वो सूंड से सहलाते हैं
अपने मरे हुए बच्चों के कंकालों को
वो पानी बर्बाद नहीं कर सकते
दिन-ब-दिन विकराल होते मौत के मंज़र पर

तुमने काट डाले उनके रास्ते
तुम खा गए उनके घर
तुम बढे जाते हो आगे, उनकी आत्माओं की कंदराओं में

सोमवार, 18 जुलाई 2016

समां



कृषि मंडी के दरवाजे पर
चेचाणी जी का पग पड़ गया
बिल्ली की टट्टी पर
गुस्से के मारे उन्होंने अपने करम को गलियाँ दीं
आज नहीं निहार पाएंगे वो
घर के रास्ते पर
शाम की छाँव में लहराते पेड़
और सड़क के दोनों किनारों पर
अभ्रक की चमक

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

समतल

मैं बैठ गया
एक सर्वत्रगामी बस की सभी सीटों पर
देखे कुछ हज़ार भिखारी बुड्ढे...
मृतप्राय
जिनकी दायीं आंख में एक दरार थी
जिनके कम्बलों में छेद थे
जिनकी लाशें उठने पर
धरती के कोने हो गए समतल
मिट गए दयनीय मुस्कुराहटों के गुत्थीदार गुम्बे

(बुढ़ापा - ५)

रविवार, 23 नवंबर 2014

मेरा परिचय और अन्य महत्वपूर्ण बातें

तो अब मैं एक किताब प्रकाशित करने की जद्दोजेहद में लगा हूँ। क्राउडफंडिंग कर रहा हूँ। हालाँकि लाल्टू ने मुझसे कहा था कि स्वतः प्रकाशन (पूरी तरह से नही, मुझे हिन्द युग्म के काम करने का तरीका अच्छा लगा।) की बजाय लोगों से बात करो, हिंदी साहित्य की दुनिया से परिचित हो जाओ, पर मैंने निश्चय कर लिया है कि कॉलेज से निकलने से पहले अपनी कवितायेँ अवश्य प्रकाशित करवाउँगा।
कई बार मैं आवेग में भर कर बेवकूफी भरे काम कर दिया करता हूँ। मुझे जब कवितायेँ बचकानी लगने लगती हैं तो मैं अपनी दैनिक भाग दौड़ का गुस्सा उनपर निकाल देता हूँ। हिंदी साहित्य के महान लोगों की रचनाओं के आगे मुझे अपनी रचनाएँ बचकानी लगेंगी और कुछ 70 कविताओं की राख आप हैदराबाद के किसी कूड़ेदान में पाएंगे। भाड़ में गए 4 साल की मेहनत और पढाई से लम्बे विचलन का एकमात्र कारण। 

मैं नवी कक्षा में जयशंकर प्रसाद-मैथिलीशरण गुप्त की कवितायेँ और प्रेमचंद की शुरुआती कहानियां पढ़कर बहुत प्रभावित हुआ और खुद लिखना शुरू किया। तब में एक बड़ा ही "संस्कारी" आदर्श बालक था (फेसबुक पर किसी ने बड़ा लाज़वाब पेज बना छोड़ा है।) उस वक़्त आदर्शों के बुखार में बूढ़े-दुखियारे माँ-बापों, उनकी 
विदेश में बसी अय्याश, नमकहराम (और काल्पनिक) औलादों, कल्पना ही से निकले मासूम ग़रीबों, पवित्र मित्रता के पुतलों पर कुछ एक दर्ज़न कविताएँ लिख डालीं। जिन्हे बारहवीं कक्षा में किसी शुभ तिथि को, आपने सही अंदाजा लगाया, आग के हवाले कर दिया। फिर मुझे अलंकारों का चस्का चढ़ा। दिनकर और "सुमन" को पढ़कर कुछ चार-पांच कवितायेँ ठोक डालीं जिनमे से एक ये है। मानव का पतन, विश्व का विनाश, प्रलय, प्रगति की अंधी दौड़, दोगले व्यक्तित्व वाले जहरीले लोग आदि आदि। शुक्र है उन सब को समय रहते ब्लॉग पर चढ़ा दिया। वरना आज मैं उन कविताओं की और उनकी तरह लिखी गयी कविताओं की ज़रा भी इज़्ज़त नही कर पाता। 

पर क्या हम अपने भूतकाल की तस्वीरों को जला देते हैं, केवल इसलिए कि हम थोड़े से उल्लू थे? दुःख की बात है कि आज इंटरनेट के ज़माने में थोक के भाव शब्द-वाक्य-तस्वीरें पैदा होते हैं और "बादल" में सदा सर्वदा इकट्ठे होने के बावजूद कुछ घंटों  में अपनी क़ीमत खो बैठते हैं। कई बार मुझे शक होता है कि कवितायेँ लिखने के कोई मायने रह भी गएँ हैं या नहीं। (देखिये मेरी एकाग्रता कितनी कमजोर पड़ गयी है।)

अच्छा तो मैं अपने बारे में बात कर रहा था। 

अज्ञेय, मन्नू भंडारी, दोस्तोवस्की की रचनाएँ पढ़ने के बाद मैंने अलंकारों (उपमा के अलावा) का सहारा लेना छोड़ दिया और धीरे धीरे एक अलग दिशा में बढ़ चला। मैं अब पूरी तरह से अलग कवि/लेखक और अलग इंसान हूँ (यदि मैं पैसे इकट्ठे कर पाता हूँ तो आप उन्हें जल्द ही देखेंगे)। मैं यह चाहता हूँ कि परिवर्तन की ये कवितायेँ जिन्दा रहें, भले ही तीन साल बाद जब मैं पीछे मुड़ कर देखूँ तो कुछ नज़र ना आये। 

इन लम्बे चार सालों में मैंने ना के बराबर हिंदी साहित्य पढ़ा। हिंदी कविता किस दिशा में चली गयी है इसका मेरे हाथ में कोई सुराग नहीं। टेलीविज़न और इंटरनेट के क्षितिज पर हिंदी साहित्य एक छोटा सा बिंदु है जो बिलकुल भी जगमगा नही रहा। आज हिंदी पढ़ने वाली एक सीनियर से श्रीलाल शुक्ल की "राग दरबारी" के बारे में सुना और हाथोहाथ किताब लेकर पढ़ना शुरू किया। इतनी शानदार किताब, जो 1968 में प्रकाशित हो गयी थी, कभी मेरे सामने नहीं आई और उधर चेतन भगत का लिखा रद्दी साहित्य धड़ल्ले से बिक रहा है, अंग्रेजी पाठक होने की अजीब सी दौड़ में खींच कर अच्छे-खासे अक्लमंद (जिनकी अक्ल बिलकुल भी मंद नहीं है) युवाओं के गले उतर रहा है। कभी कभी किसी हस्ती के निधन अथवा जयंती पर एकाध खबर बना दी जाती है। अरे यार, अगर साधारण दिनों पर कभी हिंदी साहित्यकार की बात नहीं करोगे तो "भावभीनी" श्रद्धांजलियों का क्या असर होगा? कैसे जानूँ इस बूरे हुए विश्व के बारे में?
इंटरनेशनल वेबसाइट्स सिर्फ इसलिए मुझे चूतिया किताबों और बेहूदी फिल्मों के एड देती हैं क्योंकि मैं एक भारतीय हूँ।

इसी बात से स्पर्श रेखा बनाते हुए चलते हैं (अंग्रेजी लुगदी साहित्य की बू आई?) और बारहवीं कक्षा की एक घटना पर इस बुरी तरह से उद्देश्यरहित, दुर्गठित वार्तालाप को ख़त्म करते हैं। 

मैंने दसवीं कक्षा के बाद अपनी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बना लिया था। अच्छा किया वरना बगल में झोला लटकाये कॉफ़ी हाउस और प्रकाशनों के चक्कर लगा रहा होता। बारहवीं कक्षा में, जब हम उस विद्यालय, जो खुद दसवीं तक हिंदी में था, में पढ़ रहे थे, अखबारों (भास्कर और पत्रिका) ने लम्बे लम्बे लेख लिखे, जनता को बताया कि किस तरह बारहवीं हिंदी माध्यम की भौतिकी की पुस्तकें कठिन हिंदी शब्दों से लदी हुईं थीं। न्यूटन के नियम और अन्य मान्यताएं (शुद्ध हिंदी में थी) उद्धरण बना कर लिखी गयीं। कहा गया कि संवेग, आवेग और घूर्णन जैसे शब्द बच्चों के लिए मुसीबत खड़ी कर रहें हैं। सब और मूर्ख लोग खड़े होकर चिल्लाने लगे कि बच्चों पर अत्याचार हो रहे हैं, बच्चों पर अत्याचार हो रहे हैं। 

ऐसा बिलकुल भी नहीं था। पढाई के मामले में मैं एक साधारण लड़का रहा हूँ और विज्ञान के मूलभूत सिद्धांत पूरी तरह से अंग्रेजी में सीखने के बावजूद मुझे कभी हिंदी माध्यम की वो किताब पढ़ने में कोई दिक्कत नही हुई। लोग इस बात को बहुत हल्का ले लेते हैं पर मुझे सेंट्रीफ्यूगल, एक्विलिब्रियम, कोरोलरी जैसे शब्द सीखने में बहुत तकलीफ हुई। पर यार जिस भाषा में तुम विज्ञान पढ़ना चाहते हो उस भाषा में सम्बंधित कठिन शब्दावली तो सीखनी ही होगी। इसमें अत्याचार की क्या बात है! हिंदी में समय "बर्बाद" करना काम आया और बाद में पिलानी में मेस वालों के बच्चों को पढाते वक़्त मुझे कोई तकलीफ नही हुई जबकि मेरे साथी जो पढ़ाने के इच्छुक होने के बाद भी पढ़ा नही पाते थे मेरी मदद माँगा करते थे। 

अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाने की जल्दी के अलावा अपना भूतकाल आपको समझा दिया है। अगली बार कुछ लिखने से पहले थोड़ी तैयारी करूँगा। "राग दरबारी" पढने के बाद शायद में पुरानी लेखनपद्धतियों थोड़ा आगे बढ़ कर, आपके थोड़ा नज़दीक आकर बात करूँगा, शायद वो कुछ जमे। 

हाँ, यदि मेरी किताब प्रकाशित करवाने में मेरी मदद करना चाहते हैं तो मुझसे ashishbihani1992@gmail.com पर संपर्क करें। अपनी कुछ तकलीफें आपके हवाले करूँगा। अभी भागता हूँ, एक प्रोटीन म्यूटैंट बनाना शुरू करना है।