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शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

धुर


किसी मुटाए हुए आदमी की अनामिका में पहनी
अंगूठी सी तुम
हतप्रभ समय-शंकु पर नकेल की तरह आरूढ़
भूतकाल की सारी घटनाएँ सिमट-गुँथकर
आतीं हैं तुम तक
और सारे संभावित भविष्य
तुमसे उत्प्रेरित
तुम्हारे होने से लक्षित
देश-काल का सुलझ जाना रिक्त व्योम में
आप्लावित इन्द्रियों के मुड़े-तुड़े बड़बड़ बिम्ब

तुम्हारा होना जैसे
ब्रह्मा की मृत्यु

गुरुवार, 15 जून 2017

चन्द्रकला: बारिश

आंधी के झकझोरे पेड़
ने झाड़ दी
घंटों से संजोई बारिश
भिगो दिया मुझे
जैसे, चन्द्रकला, तुम
फट पड़ती हो खिलखिलाहट से
मेरा कोई उद्दंड मज़ाक सुनकर
बरसा देती हो सैकड़ों थपकियाँ

जैसे थपथपाकर मेरी दादी माँ
बाजरे की लोई को
बदल देती हैं
नम सतह वाली चपटी रोटी में
वैसे ही चलता हूँ मैं तुम्हारी बगल में
स्वेद-अच्छादित
अवाक्,
मुस्काता बेढ़ब

शनिवार, 3 जून 2017

एकळा बळै

एकळा बळै सगळा
अबिगत कोई रेख खींच गयो
खेत-खेजड़ा-टेसण-ढोर-मिनख सब

साथ के चीज रो है रे
पड़े है अर उडे है
धोखेबाज़ चीज़ है रेत बड़ी
म्हें रमता धूणी री तरियां
घड़ी भर में सा छूमंतर सा
कोई नदी अठे खेले कोनी, प्रेम सूं बतियावण ने
बारला बके करे
रंग थारा थार रा बड़ा जोरदार छे
रंगां सूं आँख्यां आली करां, लाडी
इण भट्टे में रचीज्या हा के?
बळै सगळा
एकळा

गाँव-गवाड़ रे
पाणी में फ्लोराइड मरे
कुसमय, गीगला, कुसमय
म्हारा दांत पीळा होग्या
कमर झुक गी
हाडकां में जोर रह्यो कोनी
दो छाँट ने अडीकता
आभो भी सावळ टिके नईं
बळतां ने कोई शीतळ प्या दे
बावळा
एकळा बळै सगळा

पण
देस सूं बारे किसो धन गड्यो है
घणा देख्या रे शार थारा
रुळ ल्यो सब सड़कां पर
तपत में
पाणी रा भी पईसा लेवे
धी गा काड़
मिनख सो मिनख है के कोई बठे
जिन्ने देखो हल्लो, गीगला
ढोर ने हांके इयाँ आदमी हांके
तूँद आगले रे ढूँगाँ में ठोक अर खड़िया है लेणां में
अड़ मरूं अर धड़ मरूं
जीण ने जीव ने जग्याँ कोनी
जो चीनी हवा पूगे
बा सूंघ अर ई जमारो अस्पताळ पूग जावतों
भाईजी-भाईजी करतां गळे मायां जाळ पड़ग्या
एकळा बळै सगळा, गीगला
सारे जमारे में
एकळा बळै

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

चन्द्रकला

स्पर्श
सुबह का चुभता दूधिया उजलापन
मेरे फ़र्श पर
किताबों और कपड़ों के बिखराव में
ऊंघ रहा है
मेरी ठुड्डी से नीचे की ओर हाथ फेरता,
घिसता हुआ लुप्त हो जाता है
मेरे उदर तक पहुंचते-पहुंचते

प्रत्युत्तर
उसने अपनी गहरी काली आँखों से
भावनाहीन होकर मुझे देखा, और,

“क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?”
“क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?”
की कागज़ी दीवारों में
छेद हो गए
उनसे रक्त बहने लगा, हमारे शरीरों के सहारे
जो जम जायेगा धीरे-धीरे
और जिसे झाड़ना होगा बहुत मुश्किल

शर्त
क्योंकि यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
या तुम मुझसे प्यार करती हो
और हम आमरण/आजीवन साथ रहें

महत्वपूर्ण यह है कि
रात भर रक्त में नहाएं हम एक दूसरे को बिना देखे
और बलि चढ़ाई जाये हमारी सुबह
देवताओं और भगवानों को

शह
रंगीन बादल हवाओं के दामन में लेटे-लिपटे
धरतीवालों का मुजरा देख रहें हैं
सांझ की गंध फड़फड़ाती हुई आती है
और मेरे आग़ोश से तुम्हारे न होने की गंध को
चोरों की तरह ले भागती है
आज मातम है
आज मृत्यु है
जिधर देखो उधर फैली हुई

मैं तुम्हें बताता हूँ
तुम तोप के गोले से प्रश्न दागा करती हो
भला मैं जानता भी हूँ कि मुहब्बत क्या होती है?
मैं तुम्हें बताता हूँ

हम अपनी ख़यालों की दूरबीनें अदल-बदल कर लेते हैं
और भूल जातें हैं कि कौनसी किसकी थी
अतिदूरस्थ स्वप्नों को देखते हैं दोनों
इस भ्रान्ति में खोये, कि दोनों में से एक से तो
भविष्य अवश्य दिखेगा
मैं तुम्हें बताता हूँ
हम एक दूसरे के शरीरों में अपनी नाक घुसेड़कर
कोई रास्ता ढूँढने की कोशिश करते हैं
ताकि एक दूसरे के और क़रीब पहुँच सकें
पर भटकते-भटकते इतस्ततः, पहुँच जाते हैं
अपनी ही पीठ में

मैं तुम्हें बताता हूँ
हम जो कर रहें हैं
वो वही है

प्रहार
मैं तुम्हारी उदासी पर लिख रहा था
धागे गूंथ रहा था तुम्हारी ख़ामोशी में से

तुम फिच्च से हँस दीं
घुटे-पिसे लफ़्ज़ों की एक उतावली धारा
थूक दी तुमने
और तोड़ दी मेरी कविता



(यात्रा पत्रिका में "चंद्रकला" श्रृंखला की चार कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं. शेष यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ, जो नहीं हुई; अब देख कर समझ आता है क्यों नहीं हुईं.)

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

चेहरा

आसमान और जमीन के दैनिक कार्यक्रम में
कुचले हुए ऐसे कुछ क्षण होंगे
जब तुम्हें ज़्यादातर चीज़ें याद नहीं रहेंगी

तुम्हें याद नहीं रहेगा कि उस दिन क्या वार था
स्कूल में क्या पढ़ाया था
कोहनी पर कहाँ चोट आई थी
किसने बाग़ से खदेड़ कर भगाया था
या कौनसी सब्जी बनी थी

तुम भूल जाओगे कि
उस दिन टीचर ने खींचकर तमाचा मारा था
और कक्षा के छुट्टे सांडों ने मैदान में खूब दौड़ाया था
तुम भूल जाओगे
कि तुम्हारी गोद में बैठे मासूम पिल्लों की माँ
से तुम मुश्किल से जान बचाकर भागे थे
और अस्पताल के पिछवाड़े में पड़ी गन्दगी में तुम भागे  थे
एक अदना डाम बचने की ख़ातिर

पर उसी उहापोह में कहीं
मम्मी ने अपनी बनी अधहरी-अधखरी स्वेटर
तुम्हारे बालों में फसे तमाम ताम-झाम को
हटा कर फँसा दी तुम्हारे गले में
और इस अनुक्रम के बाद दोनों कन्धों को झंझोड़ दिया
हलके से
उस घर्षण से पैदा हुई गर्मी को गले से लगाए
तुम पोपली हंसी हंसोगे अपनी खाट में पड़े
कहीं दूर भविष्य में
कभी नहीं भूलोगे
हरे जालीदार अँधेरे में जद्दोज़हद करना और
अंततः गुफा के प्रकाशित अंत पर पाना
मम्मी का प्यार से लदा चेहरा

मंगलवार, 15 मार्च 2016

प्रहार

मैं तुम्हारी उदासी पर लिख रहा था
धागे गूंथ रहा था तुम्हारी ख़ामोशी में से


तुम फिच्च से हँस दीं
घुटे-पिसे लफ़्ज़ों की एक उतावली धारा
थूक दी तुमने


और तोड़ दी मेरी कविता

(चंद्रकला-९)

रविवार, 21 जून 2015

जूतमपैजार

पसीने से तरबतर
दढ़ियल दद्दा ने
अपने घिसे फ्रेम और मोटे लेंस वाले चश्मे को
नीले- सलेटी चैक्स छपी लुंगी पर साफ़ किया
और नए-नवेले अंधड़ में से
सड़क के पार देखा
इमारतों पर जमी धूल की चद्दरें बदल दी गयीं हैं
झाड़ दिए गए हैं पेड़ों के लिबास
हवाएं फटे गले से घोषणा करती हैं
वर्षा के आगमन की

वर्षों से जारी हानिकारक ज़र्दे के सेवन से
भूरे-कत्थई पड़े दांतों पर उन्होंने
जीभ फिराई और
नमक, पानी और धूल का मिश्रण
सड़क के किनारे थूक दिया

बारिश की जूतमपैजार के समक्ष उन्होंने अपना
झुर्रियों भरा चेहरा पेश कर दिया;
किसी कारण से उन्होंने
अपनी नवजात पोती को याद किया
जिसने चलाये थे उनके चेहरे पर
नन्ही लातें और घूंसे
और मूत्र की गर्म धार

(बुढ़ापा-)

रविवार, 18 जनवरी 2015

मुस्कुराहट

सवेरे के परदों
ने दिन को रास्ता दिया
और सूरज की रोशनी
धड़धड़ाती हुई उतर आई
टेबल से फर्श पर

दातुन, साबुन और किताबें गर्माहट पाकर
खुश से हो गए
परदे बाहर वाले पेड़ की पत्तियों
की भाँति
मचलना बंद कर चुके

ननिहाल के
गोबर नीपे फर्श पर बने
मांडणों सी
पारदर्शी, गोलमटोल आकृतियाँ
क्रीड़ाएँ करने लगीं
दृष्टिपटल पर

सुग्गों का एक जोड़ा
पिंजड़े का दरवाजा खुला पाकर
बिना मुझे साथ लिए ही
फट्ट-फट्ट कर उड़ गया

बलिश्त भर मुस्कुराहट
ताज सी आ बैठी उसकी
ठुड्डी पर
झड़ गए दो दर्ज़न सितारे
प्यार के मारे
दिन दहाड़े ही

(प्यार-३)