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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

दुर्भिक्ष!

आधी फटी सीमेंट की चद्दर में से
झाँकती रेत और कंकड़-पत्थर
दूर तक फैले, आसमान में मिल गए कहीं
जहाँ तक मैं और मेरा भाई टहल आए
दुनिया-जहान की बातें करते करते

कहीं रस्ते में माँ की आवाज़ सुनाई दी
ये क्या कबाड़ फैला रखा है बरामदे में
संभल कर रक्खो ये सब
आसमान के रंग, अचल जल के विशाल चेहरे
ऊंटों की टपकाई गोलियां
रंगे-पुते नकली आदर्श घर
पारदर्शी स्वप्न
कुछ टूट फूट गया तो मुझे ओळमा न देना
संभल-संभल कर कदम रखना

अन्दर रख दो सब कुछ सार सम्हाल कर
जरुरत पड़े तब निकाल लाना

पर हम जानते हैं कहीं गहरे
अंतस में
अगर जमा कर रख दिया इन सबको
किसी ताक में अगर
बिखर जायेंगे रुधिर के सूखे थक्के की भांति ये
तब तुम आसमान की ओर देखकर कहोगी, माँ,
दुर्भिक्ष!

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

चन्द्रकला

स्पर्श
सुबह का चुभता दूधिया उजलापन
मेरे फ़र्श पर
किताबों और कपड़ों के बिखराव में
ऊंघ रहा है
मेरी ठुड्डी से नीचे की ओर हाथ फेरता,
घिसता हुआ लुप्त हो जाता है
मेरे उदर तक पहुंचते-पहुंचते

प्रत्युत्तर
उसने अपनी गहरी काली आँखों से
भावनाहीन होकर मुझे देखा, और,

“क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?”
“क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?”
की कागज़ी दीवारों में
छेद हो गए
उनसे रक्त बहने लगा, हमारे शरीरों के सहारे
जो जम जायेगा धीरे-धीरे
और जिसे झाड़ना होगा बहुत मुश्किल

शर्त
क्योंकि यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि
मैं तुमसे प्यार करता हूँ
या तुम मुझसे प्यार करती हो
और हम आमरण/आजीवन साथ रहें

महत्वपूर्ण यह है कि
रात भर रक्त में नहाएं हम एक दूसरे को बिना देखे
और बलि चढ़ाई जाये हमारी सुबह
देवताओं और भगवानों को

शह
रंगीन बादल हवाओं के दामन में लेटे-लिपटे
धरतीवालों का मुजरा देख रहें हैं
सांझ की गंध फड़फड़ाती हुई आती है
और मेरे आग़ोश से तुम्हारे न होने की गंध को
चोरों की तरह ले भागती है
आज मातम है
आज मृत्यु है
जिधर देखो उधर फैली हुई

मैं तुम्हें बताता हूँ
तुम तोप के गोले से प्रश्न दागा करती हो
भला मैं जानता भी हूँ कि मुहब्बत क्या होती है?
मैं तुम्हें बताता हूँ

हम अपनी ख़यालों की दूरबीनें अदल-बदल कर लेते हैं
और भूल जातें हैं कि कौनसी किसकी थी
अतिदूरस्थ स्वप्नों को देखते हैं दोनों
इस भ्रान्ति में खोये, कि दोनों में से एक से तो
भविष्य अवश्य दिखेगा
मैं तुम्हें बताता हूँ
हम एक दूसरे के शरीरों में अपनी नाक घुसेड़कर
कोई रास्ता ढूँढने की कोशिश करते हैं
ताकि एक दूसरे के और क़रीब पहुँच सकें
पर भटकते-भटकते इतस्ततः, पहुँच जाते हैं
अपनी ही पीठ में

मैं तुम्हें बताता हूँ
हम जो कर रहें हैं
वो वही है

प्रहार
मैं तुम्हारी उदासी पर लिख रहा था
धागे गूंथ रहा था तुम्हारी ख़ामोशी में से

तुम फिच्च से हँस दीं
घुटे-पिसे लफ़्ज़ों की एक उतावली धारा
थूक दी तुमने
और तोड़ दी मेरी कविता



(यात्रा पत्रिका में "चंद्रकला" श्रृंखला की चार कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं. शेष यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ, जो नहीं हुई; अब देख कर समझ आता है क्यों नहीं हुईं.)

सोमवार, 9 जनवरी 2017

दिवास्वप्न

अगर मेरे हाथ ढले होते किसी  बहुत ही मजबूत और कठोर धातु में,
मैं उखाड़ फैंकता 

कागज़ के आवरण
दीवारें-खिड़कियाँ-अलमारियाँ
सीमेंट-ईंटें-टाइल्स
सड़कें-मेट्रो-रेल की पटरियाँ
शहर के विशाल फैलाव
जंगल-जानवर-नदियाँ
घाटियाँ और उनकी हवाएँ
देश और दुनियाएँ


चीथड़े-चीथड़े कर देता
और होम देता आवाज़ों के बवंडर में
जो मैंने बनाए होते अपने हाथों से ही 


पर मैं माँस-हड्डी का कमज़ोर मानव
कोई कार टकरा जाए तो शिनाख्त करना मुश्किल हो जाता है

काश मैं दुर्दम्य होता ...
जब मैं चलता तो खरोंचें पड़ जातीं
धरती की छाती पर
उछलता तो भूचाल आ जाता
मैं बदल देता इस दुनिया का चेहरा अपने माकूल
ये सब सोचते वक़्त मैं नहीं सोचता
क्रमिक विकास के बारे में,
गाया थ्योरी के बारे में

बस जमाता जाता दुनिया के टुकड़े
अपने हिसाब से