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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

भारत में विज्ञान की दुर्दशा और भाषा विवाद

क्या कारण है कि दुनिया के दूसरे सबसे विशाल भाषी समूह होने के बावज़ूद कोई भी वैज्ञानिक शोध पत्रिका भारतीय भाषाओँ में अपने शोध-पत्रों का अनुवाद करके प्रसारित नहीं करतीं है? नेचर और स्प्रिन्गर के विलय से बने प्रकाशन दानव की पत्रिका “नेचर” का प्रमुख हिस्सा विज्ञान की विविध शाखाओं में अत्याधुनिक शोध को प्रकाशित करता है. यह पत्रिका कोरिया, चीन और जापान जैसे देशों में, उनकी राष्ट्र भाषाओँ में अनूदित-प्रकाशित की जाती है. इसी प्रकाशन की पत्रिका “साइंटिफिक अमेरिकन”, जो कि विज्ञान में अभिरुचि रखने वाले सामान्य पाठक वर्ग के समक्ष नवीन वैज्ञानिक खोजों, अविष्कारों और उनसे उत्पन्न होने वाली विचारधारा को आकर्षक तरीक़े से पेश करती है. यह पत्रिका स्थानीय अनुवादकों और प्रकाशकों के सहयोग से तकरीबन बीस भाषाओँ में प्रकाशित की जाती है, जिनमे रूसी, ताईवानी और ब्राज़ीलियाई भाषाएँ शामिल हैं. नेचर की सालाना वेटेड फ्रेक्शनल काउंट इंडेक्स के हिसाब से भारत में शोध का आयतन ताइवान, ब्राज़ील और रूस जैसे देशों को कड़ी टक्कर दे रहा है. यद्यपि इस मामले में हम चीन और अमेरिका जैसे देशों के आस-पास भी नहीं फटकते, हमारे यहाँ शोध बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है, ख़ास कर जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान में. हिंदी, मेंडेरिन के बाद दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और बोलने वालों की संख्या रूसी, जापानी, कोरियाई इत्यादि से बहुत ज़्यादा है. तत्पश्चात, तमिल/ तेलुगु/ पंजाबी/ बंगाली आदि भाषाएँ भी बहुत पीछे नहीं हैं.

इसका ये अर्थ नहीं है कि भारत में शोध की स्थिति संतुष्टिपूर्ण है. बस यह कि अपने सामर्थ्य का एक नगण्य अंश देता हुआ भारत भी बहुत महत्वपूर्ण है. शोध की बढ़ोतरी से भी खुश मत होइएगा, सरकार ने जो अभी आधारभूत शोध की फंडिंग पर कुल्हाड़ी चला दी है उसका असर कुछ समय में नज़र आयेगा. डेढ़ अरब की आबादी वाले हमारे देश से जितने वैज्ञानिक शोध पत्र निकलते हैं उससे दो गुना ज़्यादा स्पेन से निकलते हैं और तकरीबन छः गुना चीन से. हर नेता के भाषण में हम यूएसए बनने के सपने देखते हैं. हमें याद रखना चाहिए कि मौजूदा तंग हालात के बावज़ूद यूएसए से निकलने वाला शोध आयतन में भारतीय विज्ञान का बीस गुना है!

भारत एक तेज़ी से बढती अर्थव्यवस्था है जहाँ आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा विज्ञान और प्रोद्योगिकी से वंचित है क्योंकि वो शेष छोटे हिस्से की भांति अंग्रेज़ी सीख नहीं सकता, आर्थिक और भाषिक मजबूरियों के कारण. ऐसे में सिर्फ़ अंग्रेज़ी का ज्ञान अभ्यर्थियों को कौशल और योग्यता की तुलना में कहीं आगे ले जाता है -- ऐसे स्थानों पर भी जहाँ अंग्रेज़ी की कोई आवश्यकता नहीं है. अंग्रेज़ी से इस विकारग्रस्त मोहब्बत का नतीज़ा है कि हमारे युवा दूसरे देशों की बनाई आधारभूत संरचनाओं में सस्ते बैल बनने को तैयार हैं बजाय अपने ही देश की आधारभूत संरचना को मज़बूत करने की कोशिश करने के. सच्चे अर्थों में आंत्रप्रीन्योर बनने के. उनको उदासीन महसूस कराने में हमारे संस्थानों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. UGC द्वारा अनुमोदित शोध पत्रिकाओं की सूची देख लीजिये. विज्ञान और प्रोद्योगिकी वर्ग में एक भी भारतीय भाषा का जर्नल नहीं है. बंगाली/ तमिल/ तेलुगु तो दूर की चिड़ियाएँ है, हिंदी तक में विज्ञान का दस्तावेज़ीकरण शून्य के बराबर है. क्यों कोई सीखना चाहेगा हिंदी, अगर तकनीकी रूप से मज़बूत होना चाहता हो तो? यदि कोई सीखेगा, तो उसे मिलेगा क्या पढ़ने को? UGC की सूची से बाहर भारतीय भाषाओं में विज्ञान की दुर्दशा देखकर ही दिल दुहरा होने लगता है, जहाँ विज्ञान बस जादुई दवाइयों, बॉडी-बिल्डिंग और तथ्यों का अश्लील ढेर रह जाता है.

इसकी तुलना में जापान में जीव विज्ञान के 400 शोध जर्नल्स में से 300 जापानी भाषा में प्रकाशित होते हैं. आलम यह है कि वहाँ किये जाने वाले शोध को अंग्रेज़ी में अनुवाद करने की आवश्यकता पड़ती है. इन दोनों बातों में सम्बन्ध सिद्ध नहीं हुआ है पर यह एक सम्भावना है जो हमें भारतीय भाषाओँ के लिए खोजनी होगी. अन्यथा भारतीय विज्ञान इसी लूली रफ़्तार से चलता रहेगा और देश के भावी बेहतरीन वैज्ञानिक या तो वेंकी रामकृष्णन की तरह लन्दन में पनाह पाने को भागेंगे या फिर द्विभाषी न होने के ज़ुर्म में किसी ऐसे काम को करते हुए सज़ा काटेंगे जो करना उन्हें पसंद नहीं.

संभव है कि वित्त की कमी विज्ञान के प्रसार और शोध को धीमा कर दे. पर भारत में वैज्ञानिक गतिविधियों का अभाव मूलभूत रूप से स्थानीय भाषाओँ में उसकी अनुपलब्धता के कारण है. पर हिंदी तो काफी लचीली भाषा है जो किसी भी ढाँचे में ठीक-ठीक फिट हो सकती है. तो फिर हिंदी में विज्ञान का अभाव क्यों?

कारण अनावश्यक रूप से उलझी हुई अधिकतर समस्याओं की तरह स्पष्ट है. हिंदी विश्वार्द्ध में अपनी भाषा में विज्ञान में भाग लेने के प्रयास हो ही नहीं रहें है. सभी अंग्रेज़ी के माध्यम से उत्पन्न हुए हमारे योगदान से खुश हैं जो कि भारत की विशालता और संभावनाओं के आगे नगण्य है. हमारे निकट भविष्य के लक्ष्य, सुदूर भविष्य के लक्ष्यों पर हावी हो गए हैं. यदि अंग्रेज़ी सीखने से किसी को गोल्डमेन साक्स में नौकरी मिल जाती है, वो क्यों कोशिश करेगा भारत में वैसी कंपनी बनाने की! 2003 में फ़िनलैंड के वैज्ञानिकों ने अकादमिया में बढ़ते अंग्रेज़ी के प्रयोग के प्रति चेताया था कि यदि विज्ञान से फिन भाषा को हटाया गया तो प्रकृति की बारीकियों को पहचानने के मामले में धीरे-धीरे उनकी भाषा पंगु हो जाएगी. स्पष्ट है कि हिंदी में वो असर अभी से नज़र आने लगे हैं. किसी भाषा का हाल संस्कृत और लैटिन जैसा होने में समय नहीं लगता. लगभग सामान परेशानियाँ जापान और स्पेन के वैज्ञानिकों ने भी जताईं हैं.

जैसा कि गोथे ने कहा है, “जो दूसरी भाषाओँ को नहीं जानता, वो अपनी भाषा को भी नहीं जानता”.

हिंदी के तथाकथित कर्णधार हिंदी का प्रचार-प्रसार करने और अहिंदी प्रदेशों में उसे थोपने में जुटे हैं. हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने की कोशिश हो रही है. और हिंदी के बचे खुचे वक्ता और लेखक हिंदी की जड़ों को, उसके कारकों को भूलकर, राष्ट्रभाषा होने के दंभ में भरे अन्य भारतीय भाषाओँ को सीखने से इनकार कर चुके. हिंदी का क्रमिक विकास रुक चुका. दक्षिण भारतीय सरकारी विभागों में CCTV स्क्रीन्स पर हिंदी शब्द और उनके अंग्रेज़ी अर्थ दिखाए जाते हैं और कई कर्मचारी उन्हें सीखने का प्रयास करते नज़र आते हैं. हिंदी प्रदेशों में अन्य भाषाओँ के शब्द नहीं दिखाए जाते. ये कहना भर भी हिंदी भाषियों को अटपटा सा लगेगा. जब परा-सिन्धु प्रान्तों को एकीकृत करने निकली भाषा की दूसरी संस्कृतियों को आत्मसात करने की क्षमता विन्ध्याचल पार करते करते दम तोड़ दे तो उसका राष्ट्र-भाषा बनना तो लाज़मी नहीं. बजाय दक्खिन को शामिल करने के, हमारा झुकाव रोमन और लैटिन से उद्भूत भाषाओँ की ओर है जो फाइलो-लिंग्विस्टिकली हमसे कोसों दूर है. उन तत्वों को शामिल करना प्रगतिशीलता के खिलाफ़ नहीं है पर गड्ड-मड्ड प्राथमिकताओं का नतीज़ा अवश्य है.

ट्रांस-इंडियन भाषा के नारे लगाने की बजाय बेहतर होगा कि हम लोग विज्ञान और अर्थशास्त्र जैसे विषय, जो वैश्विक प्रगति में एक देश की भूमिका और महत्ता को निर्धारित करते हैं, अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं. अंग्रेज़ी को देश के विद्यालयों में पढाए जाते हुए 180 साल हो गए हैं. हमें यह भूलना होगा कि भारत के हर कोने में लोगों को अंग्रेज़ी या हिंदी सिखाई जा सकती है. हिंदी, बंगाली, पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, उड़िया, गुजराती इत्यादि भाषाएँ उनके विशाल भाषिक आधार से ऊपर किसी वैश्विक मंच की मोहताज़ नहीं है. इतने सारे पाठकों की जरूरतों को “दुस्साध्य” कहकर दुत्कार देने की बजाय हमें उन जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए. प्रयोग के तौर पर विश्व के प्रमुख वैज्ञानिक शोध पत्रों (जिनमें से अधिकतर ओपन सोर्स हैं) का अनुवाद करके ग्रामीण स्तर तक मुहैया कराना होगा. भारतीय भाषाओँ में इस प्रयोग की पहली हकदार हिंदी होगी (2001 की जनगणना के मुताबिक 41 प्रतिशत भारतीय हिंदी समूह को मातृभाषा मानते हैं और कुल 53 प्रतिशत हिंदी को जानते समझते हैं). तत्पश्चात, अन्य भाषाएँ सीधे अंग्रेज़ी से हिंदी वाले प्रयोग की समझ काम में लेते हुए या हिंदी अनुवाद से पुनः अनुवाद कर लाभान्वित हो सकतीं हैं.

तो हिंदी को दो लम्बी दूरी की दौड़ें तुरंत शुरू करने की आवश्यकता है: विश्व भर के वैज्ञानिक शोध को यथावत हिंदी में अनूदित करना और अन्य भारतीय भाषाओँ से ऐसी शब्दावली और संरचनाएं सोखना जो हिंदी में काम लीं जा सकतीं हैं.

इस प्रकार का प्रयोग सिर्फ़ प्रयोग के लिए नहीं होगा. यदि हम इतनी जानकारी लोगों को उपलब्ध करवाते हैं,

१. भारतीय पुरातन विज्ञान के बारे में फैले झूठ को सत्यों से अलग करने में जनता की भागीदारी होगी, बशर्ते अनुवाद पूर्णतया खुले मंच पर उपलब्ध हो
२. हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के लिए तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली तैयार होगी, बशर्ते उस शब्दावली को हम संस्कृत-करण से बचा पाएं
३. हिंदी और अन्य भाषाओँ के बीच खड़ी दीवारें कमज़ोर होंगी क्योंकि इस समय इनमें से कोई भी विज्ञान के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है.
४. लोगों को उनकी अपनी भाषा में कुछ नया करने का मौक़ा मिलेगा और घरेलू इनोवेशन होने की संभावना बढ़ेगी.
५. भारत की मुख्यधारा के डिस्कोर्स में अंग्रेज़ी न जानने वाले लोगों की आवाज़ मज़बूत होगी. वर्तमान में देशज भाषाओँ को निम्न मानकर दरकिनार किया जाता है, यह सभी को विदित है.

समस्या यह है कि ये सब हवाई किले हैं. बड़ी संख्या में अलग-अलग विषयों से नौज़वान विद्वानों को व्यक्तिगत स्तर पर अनुवाद करना शुरू करना होगा. हिंदी में वैज्ञानिक डिस्कोर्स को जगह देनी होगी. हम यह मानकर विज्ञान को दरकिनार नहीं कर सकते हैं कि हम एक ग़रीब देश हैं. हमारी समस्याओं को सुलझाने के लिए बाहर से कोई नहीं आने वाला है. हो सकता है कि ये बीड़ा उठाने को पर्याप्त लोग न हों पर उस अक्रियता का अंजाम हमें ही भुगतना होगा.

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

वैदिक विज्ञान और आधुनिक विज्ञान की तुलना एक फेसबुकीय बहस

फेसबुक पर मैंने हो कागलो एक नाम के इन्सान (जिसका राजस्थान में अर्थ है, "एक कव्वा था") का ये स्टेटस देखा और मुझे लगा कि उसपर बहस होनी चाहिए. बंदा सज्जन है वर्ना इतनी गहरी बहस के बाद लोग काफी "असहिष्णु" हो जाते हैं. पर मेरे परिप्रेक्ष्य में ये विचारधारा छद्म विज्ञान है जो कि प्रकृति में, खासकर हमारे देश में, "वायरल" है. हो कागलो एक के हिसाब से ऐसा नहीं है सो ध्यान रखें, हो सकता है, रैंडम इंसान, आप उनसे सहमति प्रकट करें.
विचार यह है कि भारतीय पुरातन विज्ञान विश्व को समझने के लिए आधुनिक विज्ञान की तुलना में कितना कारगर हो सकता है.

"हो कागलो एक" का स्टेटस

अगर सब कुछ ऊर्जा ही है तो पद-अर्थ क्या है !
( if everything is energy then whats the matter ? )
जबकि सबकुछ ऊर्जा है और नियमबद्ध है ,
तब यह आसानी से समझा जा सकता है
कि प्रत्येक फोटोन ( प्रकाश की एक ज्ञात इकाई ) , प्रत्येक अणु परमाणु ( पदार्थ की एक ज्ञात इकाई ) , प्रत्येक अन्य द्रव्य इकाई नियमानुसार ही गति करती है और नियम अनुसार ही बंधती विलगति है तो ये सबकुछ जो दृश्यमान है और इसके इतर भी जो कुछ जानकारी में आता है वो सबकुछ किसी स्वचालित यंत्र की भाँति कार्य कर रहा है ।
ये पूरा का पूरा सृष्टि तंत्र जो अथाह ऊर्जा और असीम द्रव्य समेटे अथाह गहराई और अनंत दूरियों तक विस्तृत है , कुछ गिनती भर या शायद अनगिनत नियमों से आबद्ध एक बंद तंत्र है जिसमें कोई भी भीतरी या बाहरी परिवर्तन संभव नहीं है और इसकी गति एक तय गति है चाहे वो पाई के दशमलव प्रसार की तरह कितनी ही अबूझ या एक मक्खी की उड़ान की तरह कितनी ही क्लिष्ट क्यों ना हो । जबकि यह सबकुछ किसी यंत्र की तरह है जो तय नियमों से आबद्ध है और यहाँ इस तंत्र से अन्य कुछ भी नहीं है तो जो कुछ ज्ञान या बुद्धि के प्रकाश में आता है वो भी मात्र एक चलचित्र की भाँति वर्त रहा है और उसका मान सिवाय इसके कि आप इस दृश्य में कितने आसक्त हो और कुछ भी नहीं है ।
जबकि यह पूरा तंत्र विज्ञानमय ही है अतः अपरिमित योग संयोगों के उपरान्त भी इसका प्रत्येक दृश्य और इसकी गति तयशुदा ही होगी जो कि इसे समझ पाने की स्थिति में अनुमानगम्य भी होगी और गतिमान होने के उपरान्त भी स्थिर ( या स्थिरगतिज ) कहलाएगी ।
जबकि विज्ञान का होना और किसी भी बाह्य कर्ता का ना होना स्वयंमेव प्रमाण है कि यह सृष्टि मात्र किसी पूर्वघटित या पुनःपुनर्घटित होते रहने वाले एक चलचित्र के अतिरिक्त कुछ भी नहीं तो फिर मुझे बताइये --
किस तरह वर्तमान विज्ञान भारतीय वेद ज्योतिष पुराण और इतिहास से बेहतर है ? ( वहाँ यह सबकुछ लिखा है जिसका विज्ञान की संपूर्णता में निष्कर्ष निकलता है । )
किस तरह वो विज्ञान जो अपने साथ उसे प्रयोग में लाये जाने के धर्म से विहीन ( बिना precautions , guidelines और laws के ) है भारतीय पुराविज्ञान से बेहतर है ?
किस तरह उन तत्वों से जो हमारी देह और हमारे पर्यावरण में स्वतः दृष्टिगोचर होते हैं से तत्व की वो परिभाषाएं बेहतर मान ली गयी जो अत्यधिक प्रयासों के बाद कहीं मुश्किल से दृष्टि में आते हैं और जिनके दर्शन के लिए भी उन साधनों की आवश्यकता पड़ती है जो स्वयं भी कृत्रिम है और जिनमें से कुछ सुस्थिर भी नहीं ।
क्या कोई बताएगा वो किस तरह बेहतर हैं और बेहतर की उनकी परिभाषा क्या है ।
#कागलो_बोल्यो

मेरा कमेंट:

१. सब गति तय नहीं होती और सब घटनाएँ निर्धारित नहीं होती. नियम हैं तो अनिश्चितताएँ भी हैं.
२. सृष्टि पूर्वघटित या पुनःघटित है ऐसा सिद्ध नहीं हुआ है. यह एक वैज्ञानिक थ्योरी भी नहीं है, हॉकिंग ने उस विचार को संभावनाओं में शामिल किया है पर उसे सिद्ध करने का कोई तरीका नहीं है. क्योंकि मात्रा अनंत हो सकती है, संभावनाएं भी अनंत हो सकती हैं. आप यह नहीं मान सकते कि सम्भावनाएं ख़त्म होने पर घटनाओं को स्वयं को दोहराना होगा.
३. पुराणों में विचारों का नयापन अपने समय के हिसाब से बहुत अच्छा था जिसको आप अधिक से अधिक दाविन्ची और न्यूटन से compare कर सकते हैं. उन विचारों को किसी ने सिद्ध नहीं किया, extrapolate नहीं किया. वर्तमान विज्ञान ने हर परिस्थिति और विचार के लिए testable hypothesis विकसित किये हैं, जिनपर प्रयोग करके उन्हें सिद्ध किया जा सकता है. स्पष्ट है कि उस समय ऐसा करने के लिए उपकरण और वैश्विक वार्तालाप नहीं थे पर इस आधार पर किसी भी तरीके को छूट नहीं मिलेगी.
४. तत्वों की परिभाषा करने के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि वो दृष्टि के लिए कितने सुगम हैं. तत्व की सही परिभाषा वो है जहाँ वो अन्य तत्वों से पूर्णतया भिन्न है और एक स्वतंत्र चर की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है. सामान्य दृष्टि में इनको समझना जरुरी है पर उसके लिए पुरातन परिभाषाएँ स्वीकार करना आवश्यक नहीं, बस तत्वों के स्थान पर एक दूसरे पर निर्भर रहने वाले तत्व-तंत्र के रूप में चीज़ों को समझाया जा सकता है. विज्ञान में उसका उपयोग सीमित है.
५. "जिनके दर्शन के लिए भी उन साधनों की आवश्यकता पड़ती है जो स्वयं भी कृत्रिम है और जिनमें से कुछ सुस्थिर भी नहीं" -- कृत्रिम से आपका क्या मतलब है? हमारी आंख कृत्रिम नहीं है? सूक्ष्मदर्शी कृत्रिम है? कैसे? सूक्ष्मदर्शी कोशिका विज्ञान में इसलिए बेहतर है क्योंकि हम घटना के स्तर पर जा कर देख सकते हैं कि क्या हो रहा है. यदि कोई व्यक्ति यह पता करना चाहता है कि किसी जीव की जनसँख्या पर्यावरण से कैसे व्यवहार करती है तो सूक्ष्मदर्शी उसके लिए किसी काम की नहीं. विज्ञान में बेहतर और कमतर सिर्फ़ परिप्रेक्ष्य की उपयुक्तता के आधार पर निर्धारित होता है, कृत्रिम-प्राकृतिक के आधार पर नहीं, जो कि ironically अपने आप में एक कृत्रिम आधार है, हमने बना लिया है.
६. पुरातन विज्ञान का वो हिस्सा जो सैद्धांतिक रूप से सही है पुनः सिद्ध किया जाना चाहिए और उपयोग में लाया जाना चाहिए. पर पदार्थ का अध्यात्मिक आयाम मेरे विचार में इंसान की wishful thinking है जो किसी काम की नहीं है.
७. धर्म से आप शायद नैतिकता की बात कर रहें हैं. मेरे विचार में धर्म ने जबरदस्ती अपने आपको नैतिकता के प्रवर्तक के रूप में थोप रखा है. नैतिकता commensalism (साथ में कुछ अन्य घटनाक्रम भी) के कारण हमारे survival के लिए महत्वपूर्ण बनी और धर्म ने उसको "वायरल" कर दिया. नैतिक होने या नई खोज की नैतिकता को समझने के लिए पोथों की ज़रूरत नहीं है, यह समझने की ज़रूरत है कि हमारे समाज के बनने और फ़ैलने का उद्देश्य क्या है? समाज व्यक्ति को क्या उपलब्ध करवाता है और क्या अपेक्षा रखता है. साथ ही भविष्य में इन चरों में क्या जुड़ेगा. बस.


हो कागलो एक का उत्तर
जबकि सृष्टि विज्ञान मात्र हो तो सब कुछ के नियम् होंगे और अनिश्चितताएं भी मात्र उनका संयोग होंगी जिनकी प्रायिक्तायें और क्रमबद्धता भी तय होंगी भले ही वो इतनी वृहत और विस्तृत हों कि हम ना जान सकें ।
2 . मैंने निष्कर्ष की एक सम्भावना पर बात की है अन्य को ख़त्म नहीं माना है ।
3 . खुद मनुष्य से बेहतर कौनसा उपकरण है ? और किस तरह कहा जा सकता है कि उन्हें किसी ने सिद्ध नहीं किया , क्या किसी बात को सिद्ध करने के अभिनके तरीके ही सिद्ध हैं उस समय के नहीं , और क्या उस समय के बारे में हमें सबकुछ पता है ? क्या कुछ भी लुप्त या नष्ट नहीं किया गया होगा ?
4 . बात सिर्फ दृष्टि की सुगमता की नहीं है । प्यास लगती है तो पानी से बुझती है , जिन आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी आदि को तत्व माना गया उनके अनुसार हमारी जीव संरचनाएं भी विकसित होती हैं । उदाहरणार्थ आकाश के गुण शब्द के लिए कान और कंठ , वायु के गुण स्पर्श और गति के लिए त्वचा और पैर् , अग्नि के गुण रूप के लिए आँख और हाथ , जल के गुण रस के लिए रसना और उपस्थ तथा पृथ्वी के गुण गंध के लिए घ्राण और गुदा । और हमारे अंग भी उसी क्रम और रचना की सहजता में होते हैं जो प्रकृति में सहज ही दृष्टि गोचर होते हैं ... क्रमशः


मेरा उत्तर
१. पुनः कहूँगा, सभी अनिश्चितताओं में नियम निहित नहीं होते. दृष्टिगोचर विश्व में ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि प्रयिकताएँ पूरी तरह से समान नहीं हो पाती और क्रमबद्धता तय हो जाती है. इलेक्ट्रान ट्रांजीशन जैसी घटना में समान संभावनाएं हो सकतीं हैं. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आप आगे इसे assumption की तरह काम ले रहे हैं. यदि शून्य समय पर विश्व को फिर से शुरू किया जाए तो बहुत संभव है कि उसकी गति पूर्णतया भिन्न हो.
2. "जबकि विज्ञान का होना और किसी भी बाह्य कर्ता का ना होना स्वयंमेव प्रमाण है कि यह सृष्टि मात्र किसी पूर्वघटित या पुनःपुनर्घटित होते रहने वाले एक चलचित्र के अतिरिक्त कुछ भी नहीं" -- आपने अन्य को ख़त्म माना है
३. "खुद मनुष्य से बेहतर कौनसा उपकरण है?" कविता के लिहाज़ से ये काफी अच्छी पंक्ति है पर विज्ञान के लिहाज़ से बिल्कुल भी नहीं. क्लिष्टता बेहतर होने का लक्षण है ऐसा बहुत लोग मानते हैं और ये भाव बिल्कुल ग़लत है, क्रमिक विकास की ग़लत व्याख्या का कारण बनता है.
हमारी दृष्टि, स्पर्श, श्रवण, आवाज़ बहुत ही सीमित स्पेक्ट्रम वाले हैं. हमारी प्रोसेसिंग यूनिट शानदार है ये अलग बात है.
"उन्होंने सिद्ध किया होगा, हमें क्या पता" वही भाव है जो कई लोगों के ईश्वर को नकार न पाने का कारण है. हो सकता है सिद्ध किया हो के आधार पर सिद्धांत को नहीं माना जा सकता. प्रयोग और प्रपत्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण है परिणाम का पुनरुत्पादन. यदि प्राचीन वैचारिक गल्प को testable hypothesis में तोड़ कर पुनः सिद्ध कर दिया जाए तो कोई मूर्ख उसका प्रतिवाद नहीं करेगा. अन्यथा, "वेदों में सब बदा है" को कोई नहीं मानेगा
४. यहाँ भी, "प्यास लगती है तो पानी से बुझती है" ज्ञान की प्यास? साधारण प्यास? क्या है प्यास? क्या है पानी? प्रायिकता और क्रमबद्धता जैसे सूक्ष्म सिद्धांतों को आप प्यास जैसी मोटी (broad) घटना से समझेंगे? किसी कोशिका से सम्बद्ध प्रश्न का उत्तर किसी ने सूक्ष्मदर्शी से दिया है, खुरदरेपन का सुबूत एटॉमिक फ़ोर्स से दिया है तो आप उसको न मानकर अपनी आंख प्रयुक्त करने की कोशिश करेंगे?
अंग हमारे पर्यावरण के हिसाब से विकसित हुए हैं ये आप समझते हैं ये काफी अच्छी बात है पर उनके जो कारण आपने बताए हैं वो काफी ग़लत हैं. जिन चीज़ों को हम स्पर्श करते हैं, सूंघते हैं, देखकर पहचानते हैं या चखते हैं वे इन सभी तत्व-तंत्रों में फैलें हैं. किसी एक के हिसाब से एक अंग विकसित नहीं हुआ है. सिर्फ़ वैचारिक-तार्किक-भाषिक आधार पर माने जाने के कारण ये बातें निराधार हैं. वास्तव में पुरुष और प्रकृति को सामान्य विश्व में अलग करके, केवल अध्यात्मिक विश्व में एकाकार मानकर दर्शन ने पूरी कौम को ग़लत रास्ते पर डाल दिया है. जो प्रकृति में सहज दृष्टिगोचर होता है हमारे अंग उस रचना में ढले हैं क्योंकि हम उसके साथ ही विकसित हुए हैं, उसी के भाग बनकर. ये धार्मिक दर्शन का induce किया हुआ दोहरापन है जो हम लादे चलते हैं.
--- लिखते चलिए, जब तक बन पड़ेगा जवाब दूँगा.




हो कागलो एक का उत्तर
शून्य से शुरू होने पर जो भी सृष्टि बनेगी वो संयोगो के क्रमचयों में से ही कोई एक तस्वीर होगी । भले ये भी अनंत के तुल्य हो । बात ये नहीं कि जानी जाएगी या नहीं पर तय होगी । उसमें पुरुषार्थ द्वारा बदलाव की कोई सम्भावना नहीं हो सकती ।
2 . मैंने अन्य को ख़त्म नहीं माना , बल्कि सभी संभावनाओं को पूर्व घटित कहा है , कहने का अर्थ कि यदि विज्ञान ही सबकुछ है तो वो पूर्वघटित की अनंत संभव स्थितियों में से कोई एक स्थिति होगी पर किसी ऑटोमैटिक मशीन की तरह अपने निश्चित प्रोग्राम पर चलेगी । और स्थित संभावनाओं के समुच्चय से बाहर जा पाना जिसके output के लिए संभव नहीं ।
हमारे perception सीमित स्पेक्ट्रम वाले हैं जब तक कि उन्हें विकसित ना किया जाए ।
मनुष्य से बेहतर कौनसा उपकरण है पंक्ति कविता के लिहाज से बेहतर लगी उसका शुक्रिया , पर यह विज्ञान के हिसाब से अच्छी नहीं बेहद अच्छी पंक्ति है , वर्ना अब तक वो आर्टिफीसियल मनुष्य बना चुके होते ।
क्लिष्टता को मैंने बेहतर होने का लक्षण नहीं कहा , आधुनिक रसायन और भौतिकी से क्लिष्ट तो क्या होगा ।
" उन्होंने सिद्ध किया होगा हमें क्या पता " ये मेरा भाव नहीं , बात सिद्ध ना माने जाने के उस भाव की है जिसकी सिद्धि का आधार् भी आधुनिक विधियाँ हैं ।
प्यास लगती है पानी से बुझती है में पानी महत्त्व का है । खैर , मोटी घटना है आपके हिसाब से महत्वहीन होगी ।
किसी एक के हिसाब से एक अंग विकसित नहीं हुआ , पूरी देह एक साथ ही विकसित हुई , पर वो अंग उन तत्वों के लिए ही विक्सित हुए जो सहजता में मूल तत्व हैं ।

मसलन आकाश के गुण शब्द के लिए कंठ ऊपर है नीचे वायु के लिए फेफड़े और नीचे अग्नि से संबद्ध पाचन तंत्र जल और पृथ्वी से संबद्ध मल मूत्र के त्याग के लिए बने अंग ।
पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि और अहंकार के प्रभाव केंद्र देह में स्पष्ट ही नीचे से ऊपर व्यवस्थित हैं , पर जैसे सृष्टि में सबकुछ इनके घुलने मिलने से बना है वैसे ही देह भी , तो पूरी देह ही इन तत्वों से बनी है । खैर ये सब चीजें बहुत डिटेल में हैं और एक पूरा विज्ञान है जो इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है जिस तरह संरचनाएं स्वतः विक्सित हुयी हैं उनका मैनीपुलेशन भी उसी तरह बेहतर हो सकता है ।
पुरुष प्रकृति को अलग नहीं किया गया है , बल्कि नर में पुरुष तत्व का मात्रात्मक अनुपात और नारी में प्रकृति तत्व का मात्रात्मक अनुपात अधिक बताया गया है। सबकुछ प्रकृति पुरुष के संयोग से बना बताया गया है ।


मेरा उत्तर
"सबकुछ प्रकृति पुरुष के संयोग से बना बताया गया है" कहना किस प्रकार सही है? पुरुष प्रकृति से भिन्न नहीं है और न ही उसकी भौतिकी भिन्न है. सिर्फ़ परिप्रक्ष्य के लिए बर्तन प्रस्तुत करने वाला बुद्धिमान तंत्र होने से हमारे दर्शन में उसे जगह मिली है. दूसरे, नर और मादा में मूल रूप में क्या भिन्न है? x और y क्रोमोजोम? दोनों का आणविक विन्यास भी उन्हीं नुक्लियोटाइड से बना है जिनसे शेष जीनोम. सबकुछ प्रकृति का स्वतन्त्र विकास है और कुछ नहीं.
इस सम्बन्ध में इस बात को सच माना जा सकता है कि संभावनाओं का (अनंत?) समुच्चय सीमित नियमों पर काम करता है और "पुरुषार्थ" से कुछ बदला नहीं जा सकता है. उसमें समस्या यह है कि हम पुरुष को मुक्त इच्छा वाला मान रहें हैं. पर वह प्रकृति का हिस्सा है जो स्वतन्त्र रूप से विकसित होता है और निश्चित रूप से होने वाले को बदल सकता है. पर वह सम्भावना समुच्चय के बाहर नहीं जायेगा ये बिल्कुल सत्य है.

"क्लिष्टता को मैंने बेहतर होने का लक्षण नहीं कहा" जबकि आप उससे ठीक पहले कहते हैं कि मनुष्य बेहतर उपकरण है अन्यथा कृत्रिम मनुष्य बना चुके होते. जो कि सीधे सीधे मनुष्य की क्लिष्टता की ओर इंगित करता है. हमारे perception कितना भी विकसित करने पर अपनी सीमाएं पार नहीं कर पाएंगे क्योंकि वो एक सीमित और ख़ास वातावरण में विकसित हुए. संभव है कि x-रे से लदे वातावरण में दृष्टि कुछ भिन्न होती और जीनोम किसी और चीज़ का बना होता. उस हाल में उसकी कुछ अलग सीमाएं होतीं जो, पुनः, कितना भी कोशिश करने पर नहीं लांघी जा सकती. क्योंकि जब एक क्लिष्ट तंत्र विकसित होता है तो वो सभी संभव परिस्थितियों के हिसाब से विकसित नहीं होता. और हम जब पुनरुत्पादन न करने वाली "मशीन" बनाते हैं तो हम उस सीमा को लांघते हैं. मतलब उनके बिना हमारा perception पंगु है, अधूरा है.
न तो वैदिक "विज्ञान" इन सीमाओं को लांघने में कामयाब होता है, न ही लांघने का पर्याप्त सैद्धांतिक आधार (सम्भावना समुच्चय का गणितीय विवेचन) देता है.
प्यास को मोटी घटना कहना "महत्वहीन" कहने जैसा लगेगा इसीलिए मैंने "broad" लिखा था. मेरे कहने का मतलब है की जब कम चरों वाले सूक्ष्म कारकों पर आप विचार कर रहें हैं तो अधिक चरों और विशाल फैलाव वाली broad घटनाओं का उदाहरण देना उपयुक्त नहीं है. न तो उनका "उपमा" के रूप में कोई प्रभाव है, न ही समस्या को सुलझाने की क्षमता. जैसा मैंने कहा, उपकरण या समाधान समस्या के फैलाव के आधार पर बेहतर या कमतर होते हैं, न तो सूक्ष्म बेहतर है न ही क्लिष्ट.

"जिसकी सिद्धि का आधार् भी आधुनिक विधियाँ हैं", आधुनिक विधियों से ज्ञात हुआ इसलिए सिद्ध नहीं माना जाता, बल्कि आधुनिक विधियाँ इसलिए विकसित की गयीं हैं ताकि जो पुराने सीमित perception वाले तरीकों से test न किया जा सका, उस पर प्रयोग किये जा सकें. (ये तो सीधा सीधा प्रभाव और कारण का कन्फ्यूज़न है)
"एक पूरा विज्ञान है जो इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है" और उस विज्ञान को ढंग से न देखने या सीमित perception से देखने के कारण ही ऐसा छद्म-विज्ञान जन्म लेता है, जो आपने शायद हमारे ग्रंथों से सही ढंग से ही उद्धृत किया हो. आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि के साथ बेमतलब के गुण जोड़ दिए गए हैं जो उनसे कोई भिन्न वास्ता नहीं रखते. उदाहरण के लिए आकाश में शब्द. शब्द का एक अहम् हिस्सा ध्वनि है जो जल और ठोस (पृथ्वी?) में बेहतर चलता है और अन्य जानवरों द्वारा perceive भी किया जाता है (इस प्रसंग में उनके उपकरण बेहतर हैं). मष्तिष्क की कोशिकाएं उससे सम्बद्ध विचार को जन्म देंगी जो ions से बना होता है (जिसे समझने में तत्व तंत्रों का वैदिक विचार, वर्तमान प्रसंग में बुरी तरह से अक्षम है, पृथ्वी कहेगा - अहंकार उसी जगह उत्पन्न होगा जिसके अपने आप में कई भाग हैं). मन और बुद्धि, पुनः हमारे आन्तरिक पारिस्थितिकी तंत्र के "तत्व-तंत्र" हुए जो इसी प्रकार ज्यादा उपयुक्त तत्वों में तोड़े जा सकते हैं, और मेरे आस पास ही कई लोग उसकी समझ को बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ा रहें हैं.
तत्पश्चात वायु का वास्ता फेफड़ों से आगे बहुत गहरा है. यहाँ से "देह पंचतत्वों के मिलने से बनी है" सही तो साबित हो जाता है पर आपको cerebral अंगिका का उदहारण देखना चाहिए जहाँ यही सब अंगों के एक ढेर में तब्दील हो जाता है. वहां भी ये वाक्य सही तो साबित होगा पर कोई उपकरण तैयार नहीं होगा. कारण ये कि तत्वों और तत्व-तंत्रों का घुलना मिलना बहुत सूक्ष्म और नियंत्रित होता है, जिसको अग्नि-वायु... इत्यादि वाले विभाजन से नहीं समझा जा सकता.

लब्बेलुआब यह कि हमारे पोथों ने बहुत अच्छी कोशिश की है प्रकृति को समझने की और यदि भेड़ों की तरह कर्मकांडों में खोने की जगह हम उन्हें आलोचना की नज़र से देखते और उनकी सीमितताओं को नवीन विचारों से लांघने की कोशिश करते तो तो वाकई हमारा विज्ञान आधुनिक होता. इसमें वर्तमान विज्ञान से कोई भेद नहीं होता, क्योंकि दोनों एक ही चीज़ होते. पर ऐसा नहीं है. पुराना ज्ञान cerebral अंगिका की भांति सिद्धांतों का धर रह गया, सृष्टि को समझने का, सीमाओं को लांघने का उपकरण नहीं बना. और हम अगर इसी प्रकार पुराने सीमित विचारों की नए बहुमुखी विचारों से निराधार तुलना करेंगे तो कोई पुराना अनजाना, अपरिष्कृत विचार पूर्ण होकर सामने नहीं आ पायेगा, क्योंकि हम उसकी सीमितताओं को मानने को तैयार ही नहीं हैं.

मेरी ओर से इति, क्योंकि हमारा मूलभूत भिन्न विचार मेरे ख्याल से हमें मिल गया है और इस माध्यम से सुलझाया नहीं जा सकता, सहमति पर पहुँचाया नहीं जा सकता है.
पुनश्च, थोड़े कड़े शब्दों में, वैदिक ज्ञान को विज्ञान के केंद्र पर स्थापित करने के दिन लद चुके हैं क्योंकि हमने स्वतंत्रता के बाद विज्ञान से इतर मुद्दों पर ध्यान दिया और संभव है कि वही विचार अरब होकर यूरोप पहुंचे जहाँ उनकी पूजा करने की बजाय लोगों ने उन्हें परखा और कुछ नवीन और सक्षम विकसित किया. कोलोनियल कपट के शिकार होने के दुराग्रह को छोड़ कर हमें नए विज्ञान में कमर कस कर वैश्विक समाज के साथ योगदान देना चाहिए. हो सके तो हम शोध करें कि वैदिक विचार किस समय विकसित हुए और ठीक ठीक कैसे यूरोप तक पहुंचे ताकि हम वर्तमान विज्ञान के भुलाए हुए आधार के लिए कुछ आदर बचा पाएं.

उम्मीद है आपसे अन्य विषयों पर बहस होगी. इस उत्तर पर आपके विचार को ढंग से अवश्य पढूंगा.

परन्तु मेरी ओर से इति.


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यहाँ उपरोक्त बहस को मैंने ख़त्म माना है पर यदि कोई नया विचार वे प्रकट करते हैं और मुझे ज्ञात होता है, समय मिलता है तो अवश्य अपडेट करूँगा.



शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

विघ्न

तुम कूद पड़े
हज़ारों उफनते नागों के मध्य

तुम्हारी प्रदूषित फुफकारों ने,
तुम्हारी दहाड़ती कदमताल ने
रोएँ खड़े कर दिए चट्टानों के
मिटा दीं पानियों की यादें
अब वो बहते नहीं हाथियों के गालों पर
जब वो सूंड से सहलाते हैं
अपने मरे हुए बच्चों के कंकालों को
वो पानी बर्बाद नहीं कर सकते
दिन-ब-दिन विकराल होते मौत के मंज़र पर

तुमने काट डाले उनके रास्ते
तुम खा गए उनके घर
तुम बढे जाते हो आगे, उनकी आत्माओं की कंदराओं में

रविवार, 6 सितंबर 2015

राजेश जी शर्मा

राजेश जी शर्मा हमें विज्ञान पढ़ाते थे
उनको बहुत इंग्लिश नहीं आती थी
और वो अपनी बी.एससी. पूरी करने की कोशिश कर रहे थे
उनकी समस्याएं साधारण (जिनसे आप बोर हो चुके होंगे)
और जीवन मुश्किल था
वो हमें विज्ञान मेले में ले गए
सुबह क्विज के लिए तैयार होने को उठाया
हमारे दिल में विज्ञान के प्यार की अलख जगाई
हमारे घड़े को जूतों से घड़ा


अब हमने इंग्लिश सीख ली है
एम्.एससी. कर ली है
हमारे जीवन मुश्किल नहीं हैं
हमारी समस्याएं असाधारण हैं (जिनकी कविताएँ आप पढना चाहते हैं)
पर हम जब सुबह उठते हैं
तो वो हमसे पहले उठते हैं हमारी नींद में से
कमरे में टहलते हैं
कहते हैं
“क्या तुमने कभी सोचा है?”


(शिक्षक दिवस पर)

रविवार, 23 नवंबर 2014

मेरा परिचय और अन्य महत्वपूर्ण बातें

तो अब मैं एक किताब प्रकाशित करने की जद्दोजेहद में लगा हूँ। क्राउडफंडिंग कर रहा हूँ। हालाँकि लाल्टू ने मुझसे कहा था कि स्वतः प्रकाशन (पूरी तरह से नही, मुझे हिन्द युग्म के काम करने का तरीका अच्छा लगा।) की बजाय लोगों से बात करो, हिंदी साहित्य की दुनिया से परिचित हो जाओ, पर मैंने निश्चय कर लिया है कि कॉलेज से निकलने से पहले अपनी कवितायेँ अवश्य प्रकाशित करवाउँगा।
कई बार मैं आवेग में भर कर बेवकूफी भरे काम कर दिया करता हूँ। मुझे जब कवितायेँ बचकानी लगने लगती हैं तो मैं अपनी दैनिक भाग दौड़ का गुस्सा उनपर निकाल देता हूँ। हिंदी साहित्य के महान लोगों की रचनाओं के आगे मुझे अपनी रचनाएँ बचकानी लगेंगी और कुछ 70 कविताओं की राख आप हैदराबाद के किसी कूड़ेदान में पाएंगे। भाड़ में गए 4 साल की मेहनत और पढाई से लम्बे विचलन का एकमात्र कारण। 

मैं नवी कक्षा में जयशंकर प्रसाद-मैथिलीशरण गुप्त की कवितायेँ और प्रेमचंद की शुरुआती कहानियां पढ़कर बहुत प्रभावित हुआ और खुद लिखना शुरू किया। तब में एक बड़ा ही "संस्कारी" आदर्श बालक था (फेसबुक पर किसी ने बड़ा लाज़वाब पेज बना छोड़ा है।) उस वक़्त आदर्शों के बुखार में बूढ़े-दुखियारे माँ-बापों, उनकी 
विदेश में बसी अय्याश, नमकहराम (और काल्पनिक) औलादों, कल्पना ही से निकले मासूम ग़रीबों, पवित्र मित्रता के पुतलों पर कुछ एक दर्ज़न कविताएँ लिख डालीं। जिन्हे बारहवीं कक्षा में किसी शुभ तिथि को, आपने सही अंदाजा लगाया, आग के हवाले कर दिया। फिर मुझे अलंकारों का चस्का चढ़ा। दिनकर और "सुमन" को पढ़कर कुछ चार-पांच कवितायेँ ठोक डालीं जिनमे से एक ये है। मानव का पतन, विश्व का विनाश, प्रलय, प्रगति की अंधी दौड़, दोगले व्यक्तित्व वाले जहरीले लोग आदि आदि। शुक्र है उन सब को समय रहते ब्लॉग पर चढ़ा दिया। वरना आज मैं उन कविताओं की और उनकी तरह लिखी गयी कविताओं की ज़रा भी इज़्ज़त नही कर पाता। 

पर क्या हम अपने भूतकाल की तस्वीरों को जला देते हैं, केवल इसलिए कि हम थोड़े से उल्लू थे? दुःख की बात है कि आज इंटरनेट के ज़माने में थोक के भाव शब्द-वाक्य-तस्वीरें पैदा होते हैं और "बादल" में सदा सर्वदा इकट्ठे होने के बावजूद कुछ घंटों  में अपनी क़ीमत खो बैठते हैं। कई बार मुझे शक होता है कि कवितायेँ लिखने के कोई मायने रह भी गएँ हैं या नहीं। (देखिये मेरी एकाग्रता कितनी कमजोर पड़ गयी है।)

अच्छा तो मैं अपने बारे में बात कर रहा था। 

अज्ञेय, मन्नू भंडारी, दोस्तोवस्की की रचनाएँ पढ़ने के बाद मैंने अलंकारों (उपमा के अलावा) का सहारा लेना छोड़ दिया और धीरे धीरे एक अलग दिशा में बढ़ चला। मैं अब पूरी तरह से अलग कवि/लेखक और अलग इंसान हूँ (यदि मैं पैसे इकट्ठे कर पाता हूँ तो आप उन्हें जल्द ही देखेंगे)। मैं यह चाहता हूँ कि परिवर्तन की ये कवितायेँ जिन्दा रहें, भले ही तीन साल बाद जब मैं पीछे मुड़ कर देखूँ तो कुछ नज़र ना आये। 

इन लम्बे चार सालों में मैंने ना के बराबर हिंदी साहित्य पढ़ा। हिंदी कविता किस दिशा में चली गयी है इसका मेरे हाथ में कोई सुराग नहीं। टेलीविज़न और इंटरनेट के क्षितिज पर हिंदी साहित्य एक छोटा सा बिंदु है जो बिलकुल भी जगमगा नही रहा। आज हिंदी पढ़ने वाली एक सीनियर से श्रीलाल शुक्ल की "राग दरबारी" के बारे में सुना और हाथोहाथ किताब लेकर पढ़ना शुरू किया। इतनी शानदार किताब, जो 1968 में प्रकाशित हो गयी थी, कभी मेरे सामने नहीं आई और उधर चेतन भगत का लिखा रद्दी साहित्य धड़ल्ले से बिक रहा है, अंग्रेजी पाठक होने की अजीब सी दौड़ में खींच कर अच्छे-खासे अक्लमंद (जिनकी अक्ल बिलकुल भी मंद नहीं है) युवाओं के गले उतर रहा है। कभी कभी किसी हस्ती के निधन अथवा जयंती पर एकाध खबर बना दी जाती है। अरे यार, अगर साधारण दिनों पर कभी हिंदी साहित्यकार की बात नहीं करोगे तो "भावभीनी" श्रद्धांजलियों का क्या असर होगा? कैसे जानूँ इस बूरे हुए विश्व के बारे में?
इंटरनेशनल वेबसाइट्स सिर्फ इसलिए मुझे चूतिया किताबों और बेहूदी फिल्मों के एड देती हैं क्योंकि मैं एक भारतीय हूँ।

इसी बात से स्पर्श रेखा बनाते हुए चलते हैं (अंग्रेजी लुगदी साहित्य की बू आई?) और बारहवीं कक्षा की एक घटना पर इस बुरी तरह से उद्देश्यरहित, दुर्गठित वार्तालाप को ख़त्म करते हैं। 

मैंने दसवीं कक्षा के बाद अपनी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बना लिया था। अच्छा किया वरना बगल में झोला लटकाये कॉफ़ी हाउस और प्रकाशनों के चक्कर लगा रहा होता। बारहवीं कक्षा में, जब हम उस विद्यालय, जो खुद दसवीं तक हिंदी में था, में पढ़ रहे थे, अखबारों (भास्कर और पत्रिका) ने लम्बे लम्बे लेख लिखे, जनता को बताया कि किस तरह बारहवीं हिंदी माध्यम की भौतिकी की पुस्तकें कठिन हिंदी शब्दों से लदी हुईं थीं। न्यूटन के नियम और अन्य मान्यताएं (शुद्ध हिंदी में थी) उद्धरण बना कर लिखी गयीं। कहा गया कि संवेग, आवेग और घूर्णन जैसे शब्द बच्चों के लिए मुसीबत खड़ी कर रहें हैं। सब और मूर्ख लोग खड़े होकर चिल्लाने लगे कि बच्चों पर अत्याचार हो रहे हैं, बच्चों पर अत्याचार हो रहे हैं। 

ऐसा बिलकुल भी नहीं था। पढाई के मामले में मैं एक साधारण लड़का रहा हूँ और विज्ञान के मूलभूत सिद्धांत पूरी तरह से अंग्रेजी में सीखने के बावजूद मुझे कभी हिंदी माध्यम की वो किताब पढ़ने में कोई दिक्कत नही हुई। लोग इस बात को बहुत हल्का ले लेते हैं पर मुझे सेंट्रीफ्यूगल, एक्विलिब्रियम, कोरोलरी जैसे शब्द सीखने में बहुत तकलीफ हुई। पर यार जिस भाषा में तुम विज्ञान पढ़ना चाहते हो उस भाषा में सम्बंधित कठिन शब्दावली तो सीखनी ही होगी। इसमें अत्याचार की क्या बात है! हिंदी में समय "बर्बाद" करना काम आया और बाद में पिलानी में मेस वालों के बच्चों को पढाते वक़्त मुझे कोई तकलीफ नही हुई जबकि मेरे साथी जो पढ़ाने के इच्छुक होने के बाद भी पढ़ा नही पाते थे मेरी मदद माँगा करते थे। 

अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाने की जल्दी के अलावा अपना भूतकाल आपको समझा दिया है। अगली बार कुछ लिखने से पहले थोड़ी तैयारी करूँगा। "राग दरबारी" पढने के बाद शायद में पुरानी लेखनपद्धतियों थोड़ा आगे बढ़ कर, आपके थोड़ा नज़दीक आकर बात करूँगा, शायद वो कुछ जमे। 

हाँ, यदि मेरी किताब प्रकाशित करवाने में मेरी मदद करना चाहते हैं तो मुझसे ashishbihani1992@gmail.com पर संपर्क करें। अपनी कुछ तकलीफें आपके हवाले करूँगा। अभी भागता हूँ, एक प्रोटीन म्यूटैंट बनाना शुरू करना है।