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बुधवार, 25 सितंबर 2019

जहाँ अंत में / हमें अपनी ख़ुशी मिलेगी (एन बोयर, २०११)


क्रांतियों की कहानी, धुंधले विचारों की कहानी है
कंधे उचकाएँ, न उचकाएँ,
खड़े रहें, बिना सोच-विचार कुछ करें,
सोचते हुए कुछ करें, लिखे जाएं या न लिखे जाएं,

इतस्ततः घूमती औरत या लड़की हों,
जेब में धूल लिए एक औरत या लड़की
          चौकीदार की आँख में झोंकने को
                        धुएँ का एक बादल उड़ाने को

कोई अनजानी सुफैद बदली
जंगम और स्थावर शरीरों के बीच
किसी आम अकथ की,
          कहानी-सरीखी अकहानी
प्यारा-सा चलताऊ अनगढ़ कुछ --
                                             हथियार बने या नहीं, नहीं, नहीं.

कितना कम सोचा गया है श्वास लेने को
चलने को और न चलने को
मस्ती करना चाहने और बस, मस्ती कर लेने को
हर कोई बस स्वर्ग को झपटा चाहता है
          और कोई स्कूल में सशरीर नहीं है अब.

क्रांतियों की कहानी, हठधर्मियों की कहानी है
          उनके लड़खड़ाते दुराग्रहों पर
                                      टेसू बहाती:

सटीक चीज़ कहना बेवकूफ़ी है आजकल
विचार हैं नदी के पानी पर छड़ी मारते से

इंसान का हेतु नहीं रहा एक प्रिंटर का कागज़
अनगढ़ है घड़ा ही

(अनुवाद: आशीष बिहानी)


मंगलवार, 6 नवंबर 2018

अभी पढ़ा: राजेन्द्र यादव का उपन्यास "सारा आकाश"

 किताब यहाँ खरीदें
(यदि आपने "सारा आकाश" नहीं पढ़ा है तो इस आर्टिकल को न पढ़ें. spoilers ahead.)
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पता नहीं अज्ञेय को ऐसा क्यों लगा कि इस उपन्यास के प्रारंभिक और अंतिम हिस्से आवश्यक नहीं थे और एकबारगी राजेंद्र यादव ने उनकी बात मान भी ली. धर्मांध लोगों के आतंरिक अंधेपन का सती-भक्त हुज़ूमी उन्माद बनना तो सबसे बेहतरीन अंत है. शायद अज्ञेय उन लोगों में से थे जिन्हें वाकई में भारतीयों के अंतर्मुखी होने पर गर्व हुआ करता है. और फिर यह कोई अनूठे शिल्प वाला, अक्लमंद उपन्यास तो है नहीं. अपने समय की एक भयावह समस्या को जड़ से नेरेट करता हुआ उपन्यास है. अगर मैं इसका झकझोर देने वाला अंत न पढता तो शायद इस किताब का मुझपर उतना गहरा असर न होता.

कहानी का मुख्य पात्र निहायत जाहिल और आसानी से बह जाने वाला आदमी है जिसके मन के विचार बस औरों की कही बातों की प्रतिध्वनि भर है. सामाजिक-राजनैतिक बहस का आदर्श मस्तिष्कहीन कड़ाह, जिसमें किसी नए विचार के लिए सम्मान "ये तो मैंने सोचा ही नहीं" के रूप में कौंधता है. फिरकापरस्ती कि तालीम लेते "राह भटके युवक" के लिए वह एक आदर्श स्कैफोल्ड होता है, पर डिप्रेशन के मारे आत्महन्ता को दया करके थोड़ा और बुद्धिमान बना देना चाहिए. वैसे हिन्दू फिरकापरस्तों के लिए "राह भटके युवक" वाली कहानी की बहुत ज़रूरत है. हिन्दू आतंकवादियों (अभी जो पालने में पैर दिखा रहे हैं) को बस एक संगठन की छाया बनाकर दिखा दिया जाता है; उनको समझने की आवश्यकता किसी को महसूस नहीं होती (मैंने बहुत सारी किताबें नहीं पढ़ीं है. यदि आपकी नज़र में कोई हो तो ज़रूर बताएं).

खैर, अब टिन के डब्बे की तरह पराये विचारों को गड़गड़ाते इस मूरख नारसिसिस्ट को सुनते सुनते, उपन्यास के अंत तक आते आते आदमी के कान थकने लगते हैं. शिरीष. नायक के कड़ाह में तलते विचारों का एकमात्र स्रोत (हमारे देश के बुद्धिजीवियों के विचार में समाज का अकेला औथोराईज्ड स्रोत). अगर उसकी जगह प्रवीण तोगड़िया होता तो हमारा नायक त्रिपुंड लगा, खड्ग लिए भी निकल पड़ता. उसके इम्पल्स का नतीज़ा बेचारी प्रभा भुगतती रहती है. तब समर का अपने आपको यह प्रश्न पूछना अच्छा लगता है कि क्या वो वाकई में प्रभा से प्रेम करता है? हालाँकि, वो प्रश्न भी उसके दिमाग में किसी और ने ही डाला है.

पर फिर मुन्नी और प्रभा के चरित्रों की तकलीफें उतनी ही ज़्यादा प्रभावित करतीं हैं क्योंकि उनका गला समाज तो घोट ही रहा है, उपन्यास ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. मेरे विचार में यह जान-बूझकर किया गया है और उपन्यास का वह तत्व है जो इसे एक अच्छी और ज़रूरी किताब की श्रेणी में ला रखता है. प्रेत बना नायक, पुलिस, अनमने श्रद्धालू और खिडकियों से झांकती सहमी औरतें. हमारा समाज सचमुच इनेक्शन का मारा था. लोग अन्याय के खिलाफ दंगे के भय से नहीं बोलते थे. आज के जमाने की स्त्रियाँ तो लिंगभेद के ऐसे स्पष्ट आचरण कि ईंट से ईंट बजा डालें. हालाँकि, वो प्रवृति आज मैं हिन्दू-मुसलमान के मामले में देखता हूँ.

यह बहुत सच बात है कि हमारा समाज अतीतजीवी और पलायनवादी है पर यह भी सनद रहे कि भारत के प्राचीन विज्ञान को ग्रीक और इजिप्शियन समाज के योगदानों जैसा सम्मान कभी नहीं मिला है. बात वहीँ आ जाती है कि आखिर लट्ठ के दम पर किसको कभी सम्मान मिला है!

शायद यही बेस्ट सेलर मटेरियल होता है -- जो कि किसी भी भाषा के साहित्य का बहुत जरूरी हिस्सा है, और हमने इसे खो दिया है. अगर आप इस प्रकार के आम अपील वाले कथानकों को प्रकाशित नहीं करेंगे तो उनकी जगह गुलशन नंदा जैसे लोग ले लेंगे. पॉप सेंसिबिलिटी को चित्रित करते लेखकों को मेरा पूरा समर्थन प्राप्त है.

राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी को बराबर महत्वपूर्ण आँका जाता है -- जिससे मैं असहमत हूँ क्योंकि मन्नू भंडारी के कथानकों और चरित्रों में जो गहराई और निशब्द विस्तार होता है, राजेंद्र यादव के इस उपन्यास में तो नहीं है. अब अगर कोई कहता है कि मन्नू भंडारी का लेखन जनमानस की सशक्त अभिव्यक्ति नहीं है तो भैया, हमारे लिए तो ढंग से चित्रित फूल-पत्ती ही अच्छी. अंतरिक्ष के अँधेरे में चमकता नीला पिक्सलेटेड बिंदु किसने देखा है (जुमला Zakir Khan का है).

गुरुवार, 1 नवंबर 2018

अभी पढ़ा: पानू खोलिया का उपन्यास "वाहन"

बचपन में पानू खोलिया की एक कहानी पढ़ी थी, “प्रतिशोध”.
लगभग प्रलाप से भरी, एक बच्चे में मन की कहानी. शायद इसलिए उनके उपन्यास “वाहन” से मुझे कुछ अलग उम्मीद थी. (यहाँ खरीदें)

पर ये एक पुराने तरीके की किताब है, अपनी एक विशेष संरचना के बावज़ूद. पानू खोलिया का यह पूरा नावेल मुख्य किरदार “बाबूजी” के इर्द गिर्द घूमता है. हालांकि, लेखक परिप्रेक्ष्य को कथानक की ज़रूरत के मुताबिक बदलते रहते हैं. प्रेमचंद की तरह ही, सभी पात्रों के विचार एक अदृश्य, सर्वज्ञ नैरेटर हमें बताता रहता है. बाबूजी पुराने विचारों वाले आदमी हैं और अपने ठोस रूढ़िवादी विचारों को बदलते नहीं है, उनका बाहरी हुलिया बदलते जमाने के साथ भले ही बदलता जाय. एक तरह से वो हमारे समाज के द्योतक हैं जो पाश्चात्य संस्कृति से व्यापार करने के लिए दिखने मात्र के लिए तो मॉडर्न हो गया है पर उसके ठोस रूढ़िवाद जस के तस बने हुए हैं.

(यदि आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है तो यहाँ से आगे न पढ़ें. spoilers ahead.)

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बाबूजी बड़े निर्दयी इंसान हैं. अपनी पत्नी को वो अपने घर का नहीं मानते, बुढापे में भी. अपने बच्चों को किसी इन्वेस्टमेंट की तरह बड़ा करते हैं, जाहिर है कि ये सिर्फ मर्दों पर लागू होता है. बेटियाँ ब्याहने की जिम्मेदारी है सो निपटा देनी है. न वो हमारी हुईं, न सामने वाले की हुई ठहरीं. शेष सब उनके लिए शतरंज के मोहरे हैं, कमज़ोर निकले तो फेंक दिए जाएँगे, मज़बूत निकले तो सर पर बिठाए जाएँगे. विपक्ष वाले मोहरे एक हिंसा के साथ नष्ट कर दिए जाएँगे. कोफ़्त होती है पढ़कर. पक्का ईविल पैट्रिआर्क.
पर फिर भी उनके सीधे सादे परिप्रेक्ष्य से सहानुभूति रहती है और उनकी बढती औकात पर ख़ुशी. पानू खोलिया का प्रलाप भरा तरीका कहीं न कहीं तो घुस ही आता है और बाबूजी को दिल के करीब ले आता है. और इसी वजह से मृत्यु के दिन-ब-दिन करीब होते बाबूजी जब अपने पूरे जीवन को फिर से सोचते हैं और अपनी कठोरता और धूर्तता पर पछतावा करते हैं तो उनके पैट्रिआर्क के नीचे गहरे दबे इंसान से सहानुभूति होती है.
(spoiler section ends)

आज के समय में ये उपन्यास मेरे जैसे लोगों को इसलिए रिलेवेंट नहीं लगता क्यूंकि मुझे लगता है कि हम उस प्रकार के लोगों को पीछे छोड़ आये हैं और ज़माना बदल गया है (जैसा सब प्रेमचंद को पढ़कर कहते हैं), पर क्या सचमुच? ख़बरें पढ़ कर तो नहीं लगता. हो सकता है पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में भूले हम लोगों ने उस पीढ़ी की और बस आँखें मूँद लीं. अब जब वो पूरी हिंसा के साथ डंडे लिए अंधेरों से निकल कर आते हैं तो हम ये सोचते हैं कि कोई ऐसा कैसे हो सकता है. हम वैश्वीकरण की बाढ़ में बहकर अपने लेखों में, कला में, विज्ञान में – भूतकाल के एक पूरे पैराग्राफ को दफना चुके और उसके भूतों से बात करने का माद्दा हममें रहा नहीं. नए लेखकों के परिप्रेक्ष्य से भी ऐसे “मिथकीय” से लगने वाले लोगों को समझने की ज़रूरत है. शायद उससे हमारा साहित्य जनमानस के ज्यादा पास आ सके. 

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

नामकरण किया नहीं इसका दो साल से, पता नहीं क्यों

मजारों के दरवाज़े
तोड़ दिए गए हैं
भग्न कर दिए गए हैं
मंदिर
थरथरा रहे हैं मसीहाओं
के बुत
और लोट रहे हैं भांति भांति के गुम्बद
अवशिष्टों के ढेर में 


ढोंगी श्रद्धालुओं की भीड़
घुस गयी है बारहदरी में
जूते लिए ही
बरसा रहे हैं वो अपनी श्रद्धा
संगमरमर के फ़र्श पर
खटखटकर चलते हुए
पण्डे, पादरी और मुल्ले रो रहे हैं
विकृत शक्लें बनाकर
धाड़ें मारते

राजधानी के अन्धेरे कमरों में
खाली कटघरों को सजा सुनाते हैं न्यायाधीश
कमेटियां बनेंगी
मुआवज़े का बँटवारा होगा विजेताओं के बीच
प्रतिनिधि जाएँगे
मानवों की भोंडी नकलों के पास
देवहीन, दैवहीन
पुनः प्रतिष्ठित करेंगे
विश्वास और श्रद्धा की दुकानें
कहेंगे,
"परेड, तीनों तीन कॉलम में
झुक जाओ आगे की ओर कच्छे उतार कर;
हम तुम्हारे पिछवाड़ों पर ख़ुशी पोत देंगे!"

उनके निर्देशों का
अक्षरशः पालन होगा
क्योंकि सम्मान और अपमान के मसले
बहुत महत्वपूर्ण हैं हमारे लिए

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

कॉलोनी - 1

(द व्यूज़ एक्सप्रेस्ड हियर डू नॉट रिफ्लेक्ट दोज़ ऑफ़ दि ऑथर)
 (The views expressed here do not reflect those of the author)


रिहायशी इलाक़े में
अलग-अलग मंज़िला औक़ात वाले
हम सैकड़ों पक्के मकान
ऊटपटांग तरीक़े से जमघट बनाए
बैठे हैं उकडू
अपनी-अपनी गोद में
मोटरसाइकलों और कारों का जमावड़ा बिछाए
फुसफुसाते हैं
ठंडी हवा में ठिठुरते
ताकि सुनाई न दे
टेम्पल्स-चर्चेज़-सुपरमार्केट्स
इत्यादि पूजा के स्थलों को
हमारी हठभरी ईशनिंदा


आए बड़े पवित्रता और अनुशासन के गड़गुम्बे
कौनसे वो आज़ाद हैं इंसान की ख़रीद-फ़रोख्त से
ऊँच-नीच से
कमसेकम घरों में लोग रहते हैं प्राकृत अवस्था में
अपनी फितरतों के सबसे क़रीब

यों धूनी रमाकर
या सुफैद परिधान ओढ़कर
खूबसूरत टोपियाँ पहनकर
कोई भुला नहीं देता नग्न फिरने का आनंद

दिन भर चन्दन मलकर
अपने परिवेश का मल दूर करके
इत्र से नहाकर भी
अंततः इन लोगों के शरीर से
निकलेगी तो टट्टी ही

बुधवार, 15 नवंबर 2017

चिल्लाओ

गला फाड़ के चिल्लाओ
उगलो किसी ज्वालामुखी की भांति
इतना पागलपन
कि दिशाएं किसी मुद्दत से फ्लश हुए संडास की तरह
ठस जाएं.
ऊटपटांग आकृतियों-आवाजों-गंधों की हिसहिसाती भीड़ में
जमाना भूल जाए कि सीधी पंक्तियों में
ब्लॉक-बाई-ब्लॉक
हमें जमाने की कोई कोशिश भी हुई थी.

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

नून मीम राशिद की कविता "पहली किरन" के अनुवाद का प्रयास

Attempt at translation of the poem "First ray of light" by Noon Meem Rashid (1910-1975, Alipur Chattha, Pakistan)
(Most of the word-meanings were taken from Rekhta)
WARNING: People with strong religious sentiments, stop reading now.

कोई मुझ को दौर-ए-ज़मान-ओ-मकाँ से निकलने की सूरत बता दो
कोई ये सुझा दो कि हासिल है क्या हस्ती-ए-राएगाँ से
कि ग़ैरों की तहज़ीब की उस्तुवारी की ख़ातिर
अबस बन रहा है हमारा लहू मोम्याई
मैं उस क़ौम का फ़र्द हूँ जिस के हिस्से में मेहनत ही मेहनत है नान-ए-शबीना नहीं है
और इस पर भी ये क़ौम दिल शाद है शौकत-ए-बास्ताँ से
और अब भी है उम्मीद-ए-फ़र्दा किसी साहिर-ए-बे-निशाँ से
मिरी जाँ शब-ओ-रोज़ की इस मशक़्क़त से तंग आ गया हूँ
मैं इस ख़िश्त-कोबी से उकता गया हूँ
कहाँ हैं वो दुनिया की तज़ईन की आरज़ूएँ
जिन्हों ने तुझे मुझ से वाबस्ता-तर कर दिया था
तिरी छातियों की जू-ए-शीर क्यूँ ज़हर का इक समुंदर न बन जाए
जिसे पी के सो जाए नन्ही सी जाँ
जो इक छिपकिली बन के चिमटी हुई है तेरे सीना-ए-मेहरबाँ से
जो वाक़िफ़ नहीं तेरे दर्द-ए-निहाँ से
इसे भी तो ज़िल्लत की पाबंदगी के लिए आल-ए-कार बनना पड़ेगा
बहुत है कि हम अपने आबा की आसूदा-कोशी की पादाश में
आज बे-दस्त-ओ-पा हैं
इस आइंदा नस्लों की ज़ंजीर-ए-पा को तो हम तोड़ डालें
मगर ऐ मिरी तीरा रातों की साथी
ये शहनाइयाँ सुन रही हो
ये शायद किसी ने मसर्रत की पहली किरन देख पाई
नहीं इस दरीचे के बाहर तो झाँको
ख़ुदा का जनाज़ा लिए जा रहे हैं फ़रिश्ते
उसी साहिर-ए-बे-निशाँ का
जो मग़रिब का आक़ा था मशरिक़ का आक़ा नहीं था
ये इंसान की बरतरी के नए दौर के शादयाने हैं सुन लो
यही है नए दौर का परतव-ए-अव्वलीं भी
उठो और हम भी ज़माने की ताज़ा विलादत के इस जश्न में
मिल के धूमें मचाएँ
शुआ'ओं के तूफ़ान में बे-महाबा नहाएँ



Someone please tell me a way out of this age, time and space.
Someone please tell me what is the point of this fruitless existence.
Where for the strengthening of someone else's idea of civilization,
our blood is turning to wax with no justification.
I am a member of that race, whose fate is full of hardwork and is without food for the night.
And yet this race basks in the glory of days long past.
And still there is hope from some unknown magician.
O life, I am tired of this toil, day and night,
I am tired of this brick-beating.
Where are those longings of adornments, O world!,
that connected me and you?
Why does the stream of milk from your breasts not become an ocean of poison,
that can put this child to sleep...
who embraces your kind heart like a lizard,
who does not know your hidden pain;
she will have to become a tool for everyday disgrace
It is enough that, in an attempt to pacify our ancestors' souls,
we are crippled.
We have to break the chains that bind the feet of our future generations.
But O companion of my dark nights!,
are you listening to these clarinets?
Someone was able to see the first light of happiness somewhere, maybe...
No no, take a peek out of this window...
angels are carrying the casket of god almighty,
of that same unknown magician,
who was the lord of setting sun and not of the rising one.
These are the horns of a time when the man is superior to the gods, listen carefully.
This is the dawn of the new times.
Wake up, let's participate in this celebration of the new age,
let us make some noise...
in the tempests of light, let us bathe without a care.

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

उसूल

(कुछ दिनों पहले लिखी)

सड़क किनारे पगड़ी बांधे बुढऊ
अपने घुटनों पर कुहनियाँ रखे
करम पर हाथ बांधे
दूर बबूल की झाड़ियों में मूतते कुत्ते को देख रहें हैं
उनके मष्तिष्क में ख़याल कौंधता है
मुसलमान बड़े बढ़ गए हैं आजकल
उनकी चौधराहट छंटती है गाँव में
उनके लड़के जब बाहर निकलते हैं
तो बहु बेटियों को अन्दर टोरना पड़ता है
अगर उनकी लड़की ने किसी मुसलमान के हाथों मुँह काला करा लिया
तो पहले वे उस रांड का गला काटेंगे और फिर अपनी कलाई
(पर ऐसा होगा नहीं, उन्हें भरोसा है)

सड़क के दूसरी ओर
एक दढ़ियल प्रौढ़ लुंगी-टोपी पहने बैठा है उकडू
इन्हें चुरू जाना है, उन्हें बीकानेर
उसके गाँव में हिन्दू बड़े उछलते हैं आजकल
सभ्य-असभ्य, सही-ग़लत की लकड़ियाँ लिए घुमते हैं गुंडई में
वो भी अपनी बेटी का गला काट देगा
अगर उसने एक हिन्दू से शादी की
और कूद जाएगा ज़िन्नात वाले कूएँ में
(पर ऐसा होगा नहीं, उसे भरोसा है)

ये दोनों परिचित हैं एक दूसरे के "उसूलों" और रसूख़ से

पर ये शून्य की गोद भरती, गोद उलीचती संख्याएँ नहीं हैं
जो नफ़रत से नफ़रत को
कष्ट से कष्ट को काटकर शून्य में विलीन हो जाएँ

नहीं

उनके विचारों और "उसूलों" में दिशा है
और ये सदिश राशियाँ एक दुसरे से घुलतीं हैं, मिलतीं हैं
प्राचीन परकोटों से सर फोड़ते बुड्ढों की मिली जुली ताक़तों से
रस्ते नहीं बनते
बनते हैं कारागार
ऊटपटांग खम्भों वाले महल
शीशे के जननांगों वाले पुरुष और स्त्री
जो जन्म देते हैं पारदर्शी, सुघड़ समाजों को
जो किसी भी प्रकार से बदलने से साफ़-साफ़ मुकर गए हैं