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गुरुवार, 15 जून 2017

चन्द्रकला: बारिश

आंधी के झकझोरे पेड़
ने झाड़ दी
घंटों से संजोई बारिश
भिगो दिया मुझे
जैसे, चन्द्रकला, तुम
फट पड़ती हो खिलखिलाहट से
मेरा कोई उद्दंड मज़ाक सुनकर
बरसा देती हो सैकड़ों थपकियाँ

जैसे थपथपाकर मेरी दादी माँ
बाजरे की लोई को
बदल देती हैं
नम सतह वाली चपटी रोटी में
वैसे ही चलता हूँ मैं तुम्हारी बगल में
स्वेद-अच्छादित
अवाक्,
मुस्काता बेढ़ब

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

दिनचर्या

हम देखते हैं, आँखों में वितृष्णा भरे
धड़धड़ाती रेलों को, डूबते पुलों को, उठते पहाड़ों को
शांति चाहते हैं, गड़गड़ाहट के अंत में
उसके इंतज़ार में
स्कूटर के पायदान पर बैठकर
अकर्मण्य हो झांकते है
शनिवार सुबह ग्यारह बजे के
तरल निद्रालू यातायात में
जहाँ छोड़ दिए थे मुट्ठी भर भूत
कुछ मिनट पहले
वो नहीं सुनेंगे किसी रखवाली की मनुहार
दौड़ते रहेंगे वीथियों और मुंडेरों पर
रात होने तक
वो सड़क पार करेंगे
सांय-सांय करके निकल जाने वाले वाहनों को छूते हुए
एक दूसरे के हाथ पकड़े
ताकते रहेंगे फिल्मों के आसमान से भी बड़े पोस्टरों को
घंटों

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

मेरी कविता "शाप" का वीडियो




मेरी 58 कविताओं का संग्रह "अन्धकार के धागे" हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित किया गया है. यदि आपको यह कविता पसंद आती है तो इंफीबीम से संकलन की प्रति अवश्य आर्डर करें.


यहाँ में संकलन में से एक कविता, 'शाप' पढ़ रहा हूँ, गौर करें.

रविवार, 31 मई 2015

बचपन ५-८

खेल
चाँदनी के उजास में
झिलमिलाती झील के किनारे
पसरे उजाड़ में
एक छोटा लड़का और एक छोटी लड़की
एक विशाल नारंगी गेंद से
खेल रहे थे;
वो सूर्य था।

स्पीड ब्रेकर
बचपन के मैदानों से निकलकर
छोटी सी छोकरी
प्यार की ढलानों पर 
उत्साह से साईकिल दौड़ा रही थी।
रास्ते में बाँध सा ऊँचा
स्पीड ब्रेकर आया …
साईकिल उछली, लड़की सड़क किनारे खड़े
अचंभित से खम्भे के आधार पर
मुँह के बल गिरी
ठुड्डी फूट गयी, रक्त बह चला।

आधिपत्य
एक गज बाई एक गज की जमीन पर
हमने अपना आधिपत्य घोषित किया
इमारतें, रेलवे स्टेशन, खेत, टंकियाँ,
सड़कें, कीचड़, टेबलें, कुर्सियाँ,
सपने, मिटटी और चुम्बन
इन सबको लेकर शहर बनाया
भीड़ और प्रदूषण से मुक्त
रीसाइकलेबल शहर
आदर्श शहर
दो सींकें गाड़कर कागज़ से स्वागत द्वार बनाया
उसपर लिखा "कॉपीराईट © ऑल राईट्स रिज़र्व्ड"

उत्सव 
कंकड़ पत्थरों से भरे
एक उबड़ खाबड़ मैदान को मैंने
समतल बनाया
और बहत्तर-बीसी कविताएँ
बड़ी नज़ाकत से बिछा दीं

आसमान से देवताओं की जमात
ताली बजाते हुए उतरी;
मेरी कविताओं पर कूद-कूद कर
एक-एक की मिट्टी पलीद कर दी।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

श्राप

अमावस्या की रात में
जंगलों में बसी आत्माएं
हवाओं के साथ तैरती
आसमान में खूब ऊपर पहुंचकर
ठहर जातीं हैं;
दुःख के साथ देखतीं हैं
धरती पर फैले हुए नासूर को
गन्दगी और दर्द से भरी नसें,
उनके ऊपर जमीं मवाद की
थोथी सुनहली स्फटिक;
व्याकुल हो फेर लेतीं हैं
अपने चेहरे

एक स्त्री का
ममतामय षट्कोणीय आनन पिण्ड
तैर आता है शहर की छत पर
डूब जाता बर्फीले शोर में
उसके रात से काले गेसुए
ढक देते
दरिद्रता के नग्न
स्तनों और पंगुता के अदृश्य
हाथों को
सुला देते
थके हारे कामगारों को
अपने आगोश में …

उसके बालों के छोर
गुदगुदाते होठों को,
खींच देते मुस्कराहट
निद्रालु शक़्लों पर

उसकी आँखों की मद्धम रोशनी
और श्वास की गर्मी में
भूल जाते हैं शहर को चलाने वाले
अपनी चिंताएं
खेलने लगते हैं अपने सपनों में
बचपन के खिलौनों की यादों से

अपने थरथराते पीले पड़ते होठों से
वो चूमती है
चौराहे की कठोर सतह,
ये कहते हुए कि,
"खूबसूरत हो तुम,
श्राप नहीं है तुम्हारा अस्तित्व।"

उसकी त्वचा को छूते हुए
बड़ी रफ़्तार से निकल जाती हैं
घबराई गाड़ियाँ

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

ईश्वर एक उपमा है।

राजपथ के किनारे
रात के बादलों से घिरी
एक लड़की को
हवाएं चूमती हैं
और कपडे सहलाते हैं
पर वह खूबसूरत महसूस नहीं करती ,
घसीटती हुई चलती है
अपने पैरों को
कंकरीली धरती पर
दिशाओं में कुत्ते गुर्राते हैं
और फुफकारते हैं नीम के पेड़

प्यार और गोलियाँ ,
वर्षा और विघटन
गले मिलते हैं

दीर्घ उच्छ्श्वास ,
उत्तेजित रोम ,
आत्मविश्वास।
उरोज ठोड़ी की ओर बढ़ते हैं ,
भोंहे कानों की ओर

अस्तित्व के फूल खिलते हैं
एक बार फिर
यकायक भान हुआ है
त्वचा को स्पर्श का
दृष्टि को उपस्थिति का
समाप्त हो गयी है प्रलय
उदय हुआ है आह्लाद का।

उधर तूफानों के परे
आसमान में कहीं
एक ईश्वर
उत्सव और समृद्धि के ढेर में बैठा
देखता है इस सूक्ष्म ,
नगण्य जीवन को
परिवर्तित होते
नापता है उसे अपनी हथेली
की तुलना में
व्यंग्य भरी हंसी हँसता है
द्रुत निश्वास के साथ

बड़ा गर्व है उसे ,
अपनी विशालता पर ,
शक्ति पर ,
त्रिगुणातीत होने पर …

ईश्वर मूर्ख है ,
ईश्वर विपन्न है ,
ईश्वर अपूर्ण है।

ईश्वर एक उपमा है।