पागलपन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पागलपन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 21 मार्च 2026

ईरान-इजराइल-अमरीका युद्ध पर फेक खबरों का अम्बार

फेसबुक

पता नहीं ये सिर्फ मेरे फीड में हो रहा है या सभी के परंतु झूठी न्यूज़ एक अलग स्तर पर फैल रही है अब। बहुत सारे ऐसे पेजेज से पोस्ट दिखाई देतीं हैं जिन्हें मैं फॉलो नहीं करता हूँ। और उनकी पोस्ट्स साफ साफ झूठ बोल रहीं हैं, जिसका कोई आधार नहीं है। मैं ट्विटर पर इसकी अपडेट देख रहा हूं और ईरान ने कोई घोषणा नहीं की है पर इनको पता है। और ये भी साधारण झूठ नहीं है बल्कि ऐसे झूठ हैं जिन्हें हम मानने के लिए तैयार बैठे हैं। जैसे किसी भी प्रकार भारत को तेल मिले और भारत युद्ध के चंगुल में न फंसे, ऐसी मेरी इच्छा है, तो मेरे फीड में उसी प्रकार के पोस्ट दिखाई देते हैं। भारत ने जब बात की भी नहीं थी अपने जहाज़ों की सुरक्षा के बारे में, तब ही इन्होंने कह दिया कि ईरान ने भारतीय जहाज़ों को जाने दिया। तब ऑनलाइन ट्रैकर्स डिस्कस कर रहे थे कि ये परिमल भाग रहा है और पार कर चुका है। परंतु क्या उसे ईरान की सहमति थी? पता नहीं। फिर नए आयतुल्ला, नेतन्याहू के मरने की खबरें -- ताकि युद्ध खत्म हो जाए ऐसा महसूस हो -- जो सरासर झूठ है। फिर एक कोई अमेरिका रडार सिस्टम पर मिसाइल पड़ने की फोटो -- बड़ा साफ सुथरा नुकसान हुआ था, देखो साम्राज्य वादियों को मजा चखाया गया, मजेदार। कम से कम दो क्षण के लिए में पूरी तरह से स्वीकार कर चुका था। ये है शक्ति डाटा सेंटर की। स्ट्रेटेजिक टारगेट्स तो आप चिन्हित कर ही सकते हो, भावुक जनता को भी ठीक ठीक वही झूठ बोल सकते हो जो उन्हें सबसे आसानी से गुमराह करे। इस परिस्थिति में व्यक्ति सिर्फ यह नहीं सोचता कि अमुक अमुक उनके राजनैतिक विरोधी हैं बल्कि ये भी सोचते हैं कि हम जीत रहे हैं और अमुक हार रहे हैं। जिससे प्रतिद्वंदिता और व्यक्तिगत नफरत और बढ़ जाती है। दीलचसप।

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

चुप्प चीख

 

थरथराते हुए

बॉल पेन का

गोल गुल चलने लगता है 

मलेरिया बुखार सा 

एक क्षण रफ़्तार से

फिर अवरोह में मंथर

गहरे गड्ढे में गिरने से ख़ुद को रोकता 


कोई सांड 

लकड़ी के दरवाज़े पर बार-बार 

सिर मारता है 

दरवाज़ा पसीने से लथपथ, चरमराता है 

फिर धीमे से साँस लेता 

अपनी जगह वापस आता है 

अपने जीवन के बचे खुचे क्षण गिनता 


फिर

वो दहाड़ कर टूटता है

अँधेरी गहराइयों में उसके

परखच्चे उड़ जाते हैं


परखच्चे उड़ जाते हैं

पन्नों के, जिल्द के

गुल खुरचता है खाली पन्नों को इतना

ऊपर नीचे दाएं-बाएं

किसी चीख की अवशिष्ट तरंग सा


नीचे, जमीन हो जाती है तितर-बितर

क्षीण हो जाता है एक ग्रह का केंद्र

और

बॉलपेन झल्लाता घिसटता रहता है

अँधेरी, रिक्त दिशाओं में

बुधवार, 14 नवंबर 2018

सुरसा के मुख से : हमारे जमाने के भय : स्क्रीन


समक्ष खड़े शख्स के शब्दों से भागते हुए
उसके चेहरे के उतारों और चढ़ावों पर निगाह सरकाते हुए
तुम धीरे धीरे नीचे आते हो
और अन्यमनस्कता को बड़े यत्न से छुपाकर
आर्त्त बेबसी जाहिर करते हुए
कान खड़े किये फ़ोन की तरफ देखते हो
नोटिफिकेशन या मैसेज न हो तो समय ही देख लो

पर
स्क्रीन में
एक घातक दरार है
भाग कर तुम लैपटॉप का फ्लैप खोल कर देखते हो
बातचीत के प्रवाह पर बड़ी अशिष्टता से कुल्हाड़ी चलाकर
उद्विग्नता तुम्हारी एक झटके से झन्नाकर पहाड़ी से कूद जाती है
टूटी हुई स्क्रीन के चर्राकर बाहर आए कोनों के पीछे
सिलिकॉन की हरी सर्किट छपी परत की झलक
त्राहि! त्राहि!
कलाई पर पहनी स्मार्टवाच पर रग्गे आ लगे हैं कहीं से
कुछ कह पाने की हालत में नहीं है वो
डेस्कटॉप, किंडल, टेबलेट
किसी अनदिखे स्क्रीन-संहार की शिकार हो चुकीं
घबराहट के मारे लम्बी सांस लेकर तुम
यह मानने की कोशिश करते हो
कि तुम ब्रह्माण्ड में अकेले हो
तुम्हारी कनपटियों से पसीने के नाले बह चलते है
और नसों की धमक से छत हिलने लगती है
स्वप्न से झटके से उठकर
१२X१२ के शीशे में
देखते हो अपनी भयातुर आकृति को
काश पिक्सलर उसे
टच अप करके, लाइकेबल बना कर
इन्स्टाग्राम पर पोस्ट करने की गुज़ारिश करे तुमसे
अधीर होकर दिलासा देते हो स्वयं को
दुनिया से सीधे बात करते वक़्त भी तुम
लगभग वही काम करने की क्षमता रखते हो...
पर क्या सच में?

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

बकरी के लिए रसगुल्ले


हिनहिनाते हुए स्कैनर्स
तेज, गोल मटोल और दक्षिण को झुके हुए
खुली अलमारियों में
इतिहास की घोड़ेदार किताबें
जैसे कोई छुई-मुई


बारह बहियाँ, दो सौ पेट
अपने में ब्रह्माण्ड समेट

नहींनहीं
येक्यालिखदिया
फिरसेलिखनापड़ेगा

तेज, गोल मटोल और दक्षिण को झुके हुए
गुम्बदों के भाल पर चीथड़े सूखे हुए
स्कैनर्स -- हिनहिनाए
भरा गुड़कता लोटा, खोट समेत ही लौटा
उसकी धृष्टता पर हमें खेद है
पर इसमें रेल का देरी से चलना कारण नहीं है
हटाओयारकुछऔरलिखतेहैं
साक्षात् अल्ला की मर्ज़ी से
हैं?

अल्ला? अल्ला यहाँ लूणी के घाटों की देवी है
सब घाटों की
उनके सर पर काँटों का ताज़ है
और अधोवस्त्र के तौर पर स्क्विड के छुअन्तुओं का घाघरा
हम और किसी अल्ला को नहीं जानते
---
तो साक्षात् अल्लाबीबी की मर्ज़ी से
सिसीफस पत्थर लुढ़काता बीबी के गुणगान करता आगे बढ़ा
चोटी पर पहुँचकर उसने सूखते चीथड़ों में से एक
बीबी के नोन-इश्टोप सेवक पहाड़ी बकरे को दिया
और पत्थर को दक्षिण दिशा की ढाल पर रवाना किया
ग्रामीणों ने बीबी की पीठ की ओर से आते पत्थरको
उनका प्रसाद माना
और वेदों ने उनका गुणगान किया
देवताओं ने पुष्पवृष्टि की
जनसाधारण से जयजयकार किया
प्रसाद लुढ़कता हुआ हेडीज़ पर बने बाँध से जा टकराया
चट-चट-चट करके बाँध फटा
बाँध की डूब में फंसे जीवों और वनस्पति की आत्माओं
को मुक्ति प्राप्त हुई
हेडीज़ अब लूणी बन गयी
पांच साल में एक बार बहती है
घाट उसके किनारे फिर भी बना दिए गए हैं
सभी पर अल्लाबीबी की मूर्तियाँ स्थापित हैं
श्रद्धालुओं का मेला लगता है
जो कोई प्रसाद पाता है, धन्य हो जाता है
स्कैनर्स-लोटे-रेलें हिनहिनाए
वेदों ने उनका गुणगान किया
देवताओं ने पुष्पवृष्टि की
बोल अल्लामाता की जय

अबठीकहै

अरे ठीक कैसे है?
खुली अलमारियों में
इतिहास की घोड़ेदार छुईमुई किताबें?
दिव्य दर्शन से भरे बारह बहियाँ, दो सौ पेट?
उनका क्या हुआ?
लोटे के प्रासंगिक होने का क्या आशय है?
रेल के अप्रासंगिक होने का क्या आशय है?
.
.
.
सुण भेंणचोद
सुबह से पडारा पसार के बैठा
बीबीगान को ध्यान से सुने नहीं है
मैं तब से भूखा-प्यासा अरड़ा रहा हूँ
प्रसाद पा के निकल यहाँ से मुफ़्तखोर


चलो भाय
आज के आनंद की जय
जहां मतिमंद घूमते होकर अभय
सर ऊंचा करके
फ़ोकट में ज्ञान प्राप्त करते
बीबी की उस पावन भूमि की जय
हर हर बहादेव!

बुधवार, 15 नवंबर 2017

चिल्लाओ

गला फाड़ के चिल्लाओ
उगलो किसी ज्वालामुखी की भांति
इतना पागलपन
कि दिशाएं किसी मुद्दत से फ्लश हुए संडास की तरह
ठस जाएं.
ऊटपटांग आकृतियों-आवाजों-गंधों की हिसहिसाती भीड़ में
जमाना भूल जाए कि सीधी पंक्तियों में
ब्लॉक-बाई-ब्लॉक
हमें जमाने की कोई कोशिश भी हुई थी.