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बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

कॉलोनी - 1

(द व्यूज़ एक्सप्रेस्ड हियर डू नॉट रिफ्लेक्ट दोज़ ऑफ़ दि ऑथर)
 (The views expressed here do not reflect those of the author)


रिहायशी इलाक़े में
अलग-अलग मंज़िला औक़ात वाले
हम सैकड़ों पक्के मकान
ऊटपटांग तरीक़े से जमघट बनाए
बैठे हैं उकडू
अपनी-अपनी गोद में
मोटरसाइकलों और कारों का जमावड़ा बिछाए
फुसफुसाते हैं
ठंडी हवा में ठिठुरते
ताकि सुनाई न दे
टेम्पल्स-चर्चेज़-सुपरमार्केट्स
इत्यादि पूजा के स्थलों को
हमारी हठभरी ईशनिंदा


आए बड़े पवित्रता और अनुशासन के गड़गुम्बे
कौनसे वो आज़ाद हैं इंसान की ख़रीद-फ़रोख्त से
ऊँच-नीच से
कमसेकम घरों में लोग रहते हैं प्राकृत अवस्था में
अपनी फितरतों के सबसे क़रीब

यों धूनी रमाकर
या सुफैद परिधान ओढ़कर
खूबसूरत टोपियाँ पहनकर
कोई भुला नहीं देता नग्न फिरने का आनंद

दिन भर चन्दन मलकर
अपने परिवेश का मल दूर करके
इत्र से नहाकर भी
अंततः इन लोगों के शरीर से
निकलेगी तो टट्टी ही

रविवार, 31 मई 2015

बचपन ५-८

खेल
चाँदनी के उजास में
झिलमिलाती झील के किनारे
पसरे उजाड़ में
एक छोटा लड़का और एक छोटी लड़की
एक विशाल नारंगी गेंद से
खेल रहे थे;
वो सूर्य था।

स्पीड ब्रेकर
बचपन के मैदानों से निकलकर
छोटी सी छोकरी
प्यार की ढलानों पर 
उत्साह से साईकिल दौड़ा रही थी।
रास्ते में बाँध सा ऊँचा
स्पीड ब्रेकर आया …
साईकिल उछली, लड़की सड़क किनारे खड़े
अचंभित से खम्भे के आधार पर
मुँह के बल गिरी
ठुड्डी फूट गयी, रक्त बह चला।

आधिपत्य
एक गज बाई एक गज की जमीन पर
हमने अपना आधिपत्य घोषित किया
इमारतें, रेलवे स्टेशन, खेत, टंकियाँ,
सड़कें, कीचड़, टेबलें, कुर्सियाँ,
सपने, मिटटी और चुम्बन
इन सबको लेकर शहर बनाया
भीड़ और प्रदूषण से मुक्त
रीसाइकलेबल शहर
आदर्श शहर
दो सींकें गाड़कर कागज़ से स्वागत द्वार बनाया
उसपर लिखा "कॉपीराईट © ऑल राईट्स रिज़र्व्ड"

उत्सव 
कंकड़ पत्थरों से भरे
एक उबड़ खाबड़ मैदान को मैंने
समतल बनाया
और बहत्तर-बीसी कविताएँ
बड़ी नज़ाकत से बिछा दीं

आसमान से देवताओं की जमात
ताली बजाते हुए उतरी;
मेरी कविताओं पर कूद-कूद कर
एक-एक की मिट्टी पलीद कर दी।

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

शाश्वत

गांव के बाहर
दो सेवानिवृत् डोकरों ने
कंकड़-पत्थरों से अपने-अपने किले चिण रखे हैं।
उनके नाम हैं,
"हम जड़ हैं"
और
"हम चेतन हैं"।
बड़ेरों की सिखाई नीतियों और
सालों की मगज़मारी से उपजी कूटनीति
का अनुसरण करते हुए
वे एक-दूसरे पर हमले करते हैं
पुनः बनाते हैं खोये हुए परकोटे,
पाटते हैं तकनीकी खामियाँ।

सैद्धांतिक है उनके उत्तर-पडूत्तर,
सत्य ही उद्देश्य है।
उसे पाने की दौड़-धूप में
अनंत के दोनों छोरों के बीच कहीं भी
नहीं रुकते वो…
उनका होना और नित्य लड़ना जरुरी है,
है विश्व के हित में।

(बुढ़ापा-१)

रविवार, 30 नवंबर 2014

बकैती की आज़ादी

इंटरनेट विश्व, मूर्खों, महापुरुषों और खूबसूरत लड़कियों के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने के लिए सुलभ ज्ञानालय है। कम से कम मेरे लिए। आज, जब मेरे पास दर-दर बिना जरुरत भटकने का वक़्त नहीं है, मैं इंटरनेट के माध्यम से अपनी इन्द्रियों और जिज्ञासा को संतुष्ट करता हूँ। यदि आप एक अकादमिक संस्था में काम कर रहे हैं तो आपको टैम ख़राब करने के लिए इंटरनेट मुफ्त मिलता है। वैसे अकादमिक संस्थाओं में काम करने वाले लोगों के लिए वक़्त बर्बाद करने बहुत जरुरी है, अन्यथा अजीर्ण होने की संभावना रहती है। यहीं मैं विलायती बालाओं की क्रीड़ाएं देखकर प्रफुल्लित होता हूँ, कोशिका संचार से सम्बद्ध  शोध पत्र पढता हूँ, जैज़ (अरे इसको कैसे लिखते हैं हिंदी में मियाँ ?) सुनता हूँ, समाचार गिटकता हूँ और दुनिया भर के बतक्कड़ों की बातें सुनाता हूँ। यह मेरा पाटा है, मेरी तशरीफ़ यहीं सुखी है। मेरे कान जैसे ही कोई अजाना शब्द सुनते हैं, मेडुला अब्लोंगेटा बिना प्रमष्तिष्क से विचार विमर्श किये मेरी उँगलियों को गूगल करने का आदेश दे देती हैं। ये मेरा घर है, ये मेरा जीवन है। 
इन दिनों समाज के ठेकेदार, उदारवाद के उदार, मेरे घर, मेरी आज़ादी को उजाड़ रहें हैं। किन्हीं को मैथुन वाली फ़िल्में गन्दी लगती हैं और कुछ को मुफ़्त में संगीत/किताबें/फ़िल्में प्राप्त करने के तरीके को कुचलना है। क्योंकि सिर्फ कानूनी तौर पर खरीदने वालों के पैसों से वे नया जेट नहीं खरीद पा रहे। पॉर्न के खिलाफ बकवास करने की तो बात ही छोड़ो। पर इन सब समस्याओं का हल निकलने के लिए मेरे साथ करोड़ों अन्य लोग प्रयत्नरत होंगे और कोई न कोई रास्ता ढूंढ ही लेंगे ताकि खूबसूरती के कुछ टुकड़े गरीबों तक भी पहुँच जाएँ। 

समस्या है कि ये लोग मुझ तक पहुँचने वाले समाचारों, ज्ञान, परिप्रेक्ष्यों के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं। उनके पिछवाड़े में बड़ा दर्द है कि दुनिया का हर इंसान एकदम आदर्श इंसान क्यों नहीं है। वो लोग इतने महान हैं कि उन्हें लगता है कि उनकी महानता में कोई कमी रह गयी है जो दुनिया में अभी भी इतना पाप भरा है। कि दुनिया वाले सब मासूम हैं जो गलत परिस्थितियों में बड़े होने की वजह से दुष्ट हो गए हैं। इसी असह्य दुःख के चलते वे लम्बे, भारी-भरकम, असह्य लेख लिखा करते हैं और परिवर्तन तथा सुधार के बारे में बेमतलब बातें बका करते हैं जिनका वास्तविक विश्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला। वो बकने के अधिकार की तरफदारी करते हैं,तभी तक, जब तक कोई उनके खिलाफ नही बोल देता। ऐसा होने पर उन्हें पिछवाड़े के पोस्चर में परिवर्तन/सुधार करना पड़ता है और उसमे वीर रस भरना पड़ता है। वे सीधे तो बकने का अधिकार छीन नहीं सकते क्योंकि बकैती ही उनकी जीवनी है।  इस परिस्थिति में वे बैकग्राउंड चेक किया करते हैं। (अपना नहीं, दूसरों का) 

बैकग्राउंड चेक लोकतंत्र के लिए अच्छा ही होता है यदि आप अपनी उँगलियाँ गुदा से बाहर रखें तो। गुदा के रस्ते अपने विरोधियों की जान निकालना एक घृणित कर्म है। पर काले सफ़ेद को समझते समझते हम लोग वर्णान्ध हो गए हैं।  
चूँकि महात्मा गांधी अपने आश्रम की युवा लड़कियों के साथ अपने ब्रह्मचर्य की परीक्षा लेने के लिए सोये थे, उनके सिद्धांत समग्र रूप से गलत हैं। चूँकि बाबा रामदेव चूतिये हैं इसलिए योग को सामान्यजन तक बिना मिलावट किये लाना सम्पूर्ण रूप से व्यर्थ है। चूँकि केजरीवाल को बहुमत के दांव पेच नहीं आते, वो किसी काम के नहीं हैं। चूँकि नेहरू बहुत सारी महिलाओं के साथ रिश्ते रखते थे, उन्हें भारत के इतिहास के निचले, मैले वाले पीढ़े पर बिठाया जा सकता है। चूँकि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी घोषित कर दी थी, वो प्रजातंत्र के नाम पर काला धब्बा है। क्योंकि स्वतंत्रता के पश्चात के दंगों के लिए, चीन से हारने के लिए, सिखों की हत्या के लिए, दिल्ली की दुर्दशा के लिए यही एक एक लोग जिम्मेदार हैं और इसके कारण उनके खिलाफ मज़बूत इंटरनेट मुहिम की ज़रुरत है।  क्योंकि भारत के हम महान निवासी एकदम मासूम हैं और बिना धर्म, जाति, भाषा, देश के पचड़ों के हम बहुत ही शांति से जीवनयापन कर रहे होते। क्योंकि मासूम निरपराध लोगों को ही मदद की जरुरत है शेष जो इधर उधर से जोड़ घटाकर बाल-बच्चों का पेट भर रहें हैं उनको तो हिन्द महासागर में फेंक देना चाहिए। 

नीरस और महत्वहीन बातों पर विचार प्रकट करना कोई मुश्किल बात नहीं है इसलिए हर कोई ये करने में  लगा हुआ है। सभी लोग समस्या के आस पास घुमते हुए समस्या नाम की झाडी को पीटते रहते हैं और कहते हैं की हमारी मदद करो, हम ये समस्या को हटाकर ही रहेंगे। पर कोई जो समस्या की जड़ की ओर हाथ बढाता है तो उसे झाड़ देतें हैं कि नहीं ये संवेदनशील इलाका है। इस तरह से पूरी दुनिया में लोग सब मूर्ख हो गए हैं और इन्ही महाशय के पास सब बीमारियों का जॉन लेनन वाला इलाज़ है। कोई इनकी बड़-बड़ को वास्तविक जगत में महत्त्व तो देता नही सो "इमेजिन" करते रहते हैं। इंटरनेट काल्पनिक तो नहीं है पर आभासी तो है। यहीं महानुभावों/मोहतरमाओं की इन्द्रियां धोखा खा जातीं हैं और वो इंटरनेट के सुधार कार्य में लग जाते हैं।  ऊपर से वो अभी तक फ्रायड का मनोविज्ञान ही समझ नहीं पा रहे हैं, व्यक्तिवाद तो दूर की चिड़िया है।  

इंटरनेट तो समाज का शीशा है जिसे ९० फ़ीसदी भारत तो काम ही नहीं लेता। इसे कहाँ कहाँ से ठीक करोगे! अपने समाज की शक्ल विडरूप छे विडरूप रहणी है। ५० साल शांति से क्या गुज़ार लिए इंसानों को गुमालते हो गए हैं अपने बारे में, कंप्यूटर पर बेठकर बकचोदी कर रहे हैं।  

सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त

मैं 22 साल का हूँ और बिल्कुल भी बुड्ढा नहीं हूँ, ये बात पहले ही नोट कर ली जाये। मैं सनकी हूँ और मेरे सिर में काफी सफ़ेद बाल हैं, ये सच है। पर मैं एकदम बांका नौजवान हूँ। आई याम अवेलेबल। 

"सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त।"
अबे सालों, पागल हो गए हो ? "सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त।" तुम्हारा भेजा ठिकाने से गायब है ?
"सूर्य अस्त, पंजाबी मस्त।"
क्यों ड्रैकुला हैं पंजाब वाले ? और क्या केरल वाले सूर्य अस्त होने पर चिंता में पड़ जाते हैं ?
सूर्यअस्तपंजाबीमस्त। सूर्यअस्तपंजाबीमस्त। सूर्यअस्तपंजाबीमस्त। सूर्यअस्तपंजाबीमस्त।

एक बात बताओ पंजाब वालों तुम्हें इस गाने से घिन्न नहीं आती ? कोई इज्ज़त नहीं है तुम्हारी ? जो आया मिटटी पलीद कर गया। कोई सिर नहीं, पैर नहीं। अस्त-मस्त की अधजली तुकबंदी। सूर्य और पंजाबी में कोई रिश्ता नहीं। ये भी कह सकते हैं कि सूर्य अस्त, बंगाली मस्त। कुछ मेहनत-वेहनत की नहीं। स्क्रीन पर हिंगलिश में कर्सर घसीटा, दो आखर अपने मटर से दिमाग से निकाले, भेंस की टाँग, छिपकली की पूँछ, गाना तैयार। दिल्ली और चंडीगढ़ (हैदराबाद भी, साले हैदराबाद में भी नाच रहें हैं, वाह भारत माता वाह) के "रात्रि जीवन" जीने वाले युवाओं को मतलब थोड़ी है कि गाने के हिसाब से कौन मस्त हो रहा है और कौन अस्त।
सूर्य अस्त होने न होने से क्या होता है … जिसे मस्त रहना है वो हर वक़्त मस्त रहता है। बीकानेर में दोपहर दो बजे ठंडाई घुटती है और मोहल्ले के सारे बुढऊ पाटों पर जम ताश खेलते हैं और अर्थव्यवस्था के पतन से लेकर पोते की दस्तों तक का सारा इलज़ाम मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी पर लगाते हैं। (जब मै बीकानेर में था तब उनकी सरकार थी)
मैं ये नही कह रहा हूँ कि मेरे बचपन के समय फालतू गाने नहीं आते थे। उस वक़्त भी किसी मोहतरमा को किसी बंगले के पीछे वाली बेरी की छाँव में कांटा लग गया था तो चिल्लाने लगीं। और सारे भारत के नौजवानों के कान "ओड टू कांटा" सुनकर सतर्क हो गए। उस वक़्त ये बात काफी सामान्य लगी थी कि जो गाना सारे नौज़वानों को एक साथ रास आया है उसे तो बैन होना ही है। कांटा लगना विरह की चुभन को दर्शाता है। हमारा समाज उस चुभन को समझता है, उसे आश्रय देता है। पर इसका मतलब ये कतई नही था कि प्यार को भी आश्रय दिया जायेगा। इसलिए संभलकर, फूंक-फूंक कर पैर रखें और प्यार करें। अगर गलत व्यक्ति से प्यार कर लिया तो बदन की बोटी बोटी कर दी जाएगी।
पर अब तो टीवी ऑन किया और भांग पिए शिव-भक्तों की तरह नाचती लाइटें, अपने सीने का पसीना (सीने पे आया पसीना/मुझको तुमसे प्यार है हसीना… ये लो बन गया गाना) जीभ पर लगा कर सेक्सी दिखने वाले हीरो और उनके बगल में पहने हुए कपड़ों जितने ही कम भावों और चरित्र महत्ता वाली हीरोइन के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता। मुझे भी पार्टी पसंद है। "पॉट्टी करनी है पॉट्टी करेंगे, किसी के भी पप्पा से नी डरेंगे।" पर दिनभर सलाद खाने से ना, सलाद से नफरत हो जाती है। अरे रुको, सलाद से नफरत तो ऐसे ही हो जाती है। कोई बात नहीं।
तो इस प्रकार फिल्मे अब काँटों पर सस्ती तुकबन्दियाँ लिखने से बहुत आगे निकल चुकीं हैं। अब वे नाहिलिज्म के कुओं में उतर रहे हैं। कई बार तो इतने गहरे चले जाते हैं कि दिखाई देना ही बंद हो जाते हैं। वैसे भी चंडीगढ़ के किसी डिस्को में एक्सटेसी और कोकेन चढ़ाते युवाओं को कलाकार के दिल की इन अथाह गहराइयों से कोई मतलब तो है नहीं। आंटी पुलिस बुला लेंगी तो उनके पार्टनर हैंडल कर ही लेंगे। तो परवाह किस बात की।


मुझे लगता है कि मैं समय से पहले बूढा हो गया हूँ, सटक गया हूँ। मेरे आस पास विलायती बबूल उग रहें हैं। आई याम सेलेक्टिवली अवेलेबल।