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सोमवार, 7 दिसंबर 2020

चुप्प चीख

 

थरथराते हुए

बॉल पेन का

गोल गुल चलने लगता है 

मलेरिया बुखार सा 

एक क्षण रफ़्तार से

फिर अवरोह में मंथर

गहरे गड्ढे में गिरने से ख़ुद को रोकता 


कोई सांड 

लकड़ी के दरवाज़े पर बार-बार 

सिर मारता है 

दरवाज़ा पसीने से लथपथ, चरमराता है 

फिर धीमे से साँस लेता 

अपनी जगह वापस आता है 

अपने जीवन के बचे खुचे क्षण गिनता 


फिर

वो दहाड़ कर टूटता है

अँधेरी गहराइयों में उसके

परखच्चे उड़ जाते हैं


परखच्चे उड़ जाते हैं

पन्नों के, जिल्द के

गुल खुरचता है खाली पन्नों को इतना

ऊपर नीचे दाएं-बाएं

किसी चीख की अवशिष्ट तरंग सा


नीचे, जमीन हो जाती है तितर-बितर

क्षीण हो जाता है एक ग्रह का केंद्र

और

बॉलपेन झल्लाता घिसटता रहता है

अँधेरी, रिक्त दिशाओं में

बुधवार, 14 नवंबर 2018

सुरसा के मुख से : हमारे जमाने के भय: साहित्य बीकानेर में छपी चार कविताएँ

बोर

आँखों में रोष भरे
वो कोशिश करता है
एक चुटकुला सुनाने की
और सभा की चुप्पी उसे नागवार गुजरती है
रोष का उमड़ आता ज्वार
टकराता है
दीवारों से
जैसे तेज रफ़्तार से चलती कोई ट्रेन टकराती है
कीचड के विशाल ढेर से
एक चिपचिपा गीलापन ढ़क लेता है उसके कमरे की दीवारों को
उसकी हड्डियों में जंग लगता है
उसके घावों से पौधे उग आते हैं

कड़कड़ाकर कोई उठता है अपनी जगह है
उठने के श्रम से थककर बैठ जाता है अगले ही क्षण

बोरियत के ढेर पर लोग फेंकते हैं अधीरता से
पानी और फटे हुए रुमाल
डुबा नहीं पाते फिर भी

दबोच

एक पथरीले चेहरे वाली आग चबाती है किसी झोंपड़ी को
कर्णभेदी शोर के साथ
हवाओं को छाती पीटकर ललकारते हुए
कोई बाघ गर्दन दबाता है अपने शिकार की
हड्डियों का चटखना लाउडस्पीकर पर लगाए
कोई शरीर विघटित होता है
नाक को बींध देने वाली दुर्गन्ध के साथ

देखने वालों की आँखों में उतरे भय का
स्वाद अपनी जीभ पर लुढ़काते हुए
आँखों को टिकाए लक्ष्य
वो आगे बढ़ता है
वो कोई आम दानव नहीं है
जब तुम उससे आँखें मिलाते हो तो वो सीधे
घुस जाता है तुम्हारी हड्डियों में
और रेंगता हुआ खाता है तुम्हें सालों तक
तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध ले जाता है तुम्हें
मजबूरी के डामरी दलदल में

खड़ताल

सुबह सुबह वो नहलाये ताज़ातरीन बाल फैलाए
खड़ताल बजाती हुई निकलती है
गाँव की पहली आँख खुलने से भी पहले
पतली कच्ची कीचड़ लदी गलियों के
उबकाहट भरे जंजाल में
भोंडे और कामुक भक्ति गीत गाते हुए
वो बिछाती है घटनाओं के नए चादर
पिछले दिन के खून, विष्ठा और मीठी नमी पर

जिनका कचूमर बना देंगे हम अगले दिन अपने कदमों से
बिना रीसाइकिल किये
बिना महसूस किये
हम कुलबुलाते दैनिक चर्या से निकलेंगे 
सड़कों पर सड़कें बिछ्तीं जाएँगी
किसी दिन वो छुपा देंगी हमारे घरों की अनगढ़ बदसूरती
किसी दिन हम बस असहाय से झांकेंगे अपने अपने गड्ढों से
सुनते हुए उसकी घंटों पहले बजाई खड़ताल की गूँज

भाईसाब

भाईसाब तुम तुर्रमखां नहीं कोई
तुम्हारे जैसे तराशे नक्श फैक्ट्री में बनकर आते हैं
मेरी दुकान पर लाइन से खड़े होकर मुंहबोली रक़म देकर फ्रूट खरीदते हैं
तुमको क्यों पड़ी है मोलभाव करने की
कैशबैक देंगे तुम्हारी ई-वॉलेट पर

तुम हमें ये बताओ की तुम कौन हो और कहाँ रहते हो
नहीं, नहीं. ये पद और कर्म के ढकोसले नहीं
तुम्हारे फड़फड़ाते दिल की मांसपेशियों के बीच
खून और दिमाग़ को अलग करने वाली पाल पर
तुम्हारी जाँघों की संधि में
तुम्हारे जठर की दीवारों को सुरक्षित रखने वाली ग्रंथियों के मुँह पर
तुम कौन हो.
मैं क्या कहता हूँ कि इधर सीधे सादे लोगाँ की बीच किधर घुस गए!
जेब के कड़े हो क्या?
प्राडक्टिव नहीं होना क्या तुम्हें?

तुम घर जाओ, आर्डर प्लेस करो
बताते हैं तुमको कि अगली चीज़ क्या खरीदनी है.

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

विघ्न

तुम कूद पड़े
हज़ारों उफनते नागों के मध्य

तुम्हारी प्रदूषित फुफकारों ने,
तुम्हारी दहाड़ती कदमताल ने
रोएँ खड़े कर दिए चट्टानों के
मिटा दीं पानियों की यादें
अब वो बहते नहीं हाथियों के गालों पर
जब वो सूंड से सहलाते हैं
अपने मरे हुए बच्चों के कंकालों को
वो पानी बर्बाद नहीं कर सकते
दिन-ब-दिन विकराल होते मौत के मंज़र पर

तुमने काट डाले उनके रास्ते
तुम खा गए उनके घर
तुम बढे जाते हो आगे, उनकी आत्माओं की कंदराओं में

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

पता लगाओ

अधपुती दीवारों के चरमराते ढक्कनों को चीरकर
वो बाहर आती है, क्रोध से जलती आँखों से घूरती हुई
और अपनी सारी ताक़त से चिल्लाकर कहती है,

क्या तुमने जाना, समझा, पता लगाया?
क्या तुम सुन भी रहे थे?
तुम्हारे आँख-नाक-कान किस काम के हैं?
तुम अपने कानों में सीसा भर,
हाथों से सीना ढक कर लेट जाओ
एक मुर्दे की भांति
आसमान तुमपर तूफ़ान बरपाएंगे,
रोएंगी फ़िजाएँ


वो सुन नहीं पाया,
विचित्र आवृति वाली ध्वनियाँ
नग्न हो मिट्टी में लोट-पोट हो रही हैं
उसके घुटने कमज़ोर हो गए हैं
वो इस व्यापक उजाड़ की स्वामिनी के क्रोध से थरथराते पैरों के पास गिर पड़ता है
अपने चेहरे से मिट्टी और अश्रुओं का मिश्रण चाट कर साफ़ करता है
कोशिश करता है घटनाओं को समझने की

वो सवार हो जाती है उसे पलट कर उसके जननांगों पर
वो देखता है भयभीत, चकित, रुग्ण; एक अभूतपूर्व प्रचंडता वाला तांडव.