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बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

कॉलोनी - 1

(द व्यूज़ एक्सप्रेस्ड हियर डू नॉट रिफ्लेक्ट दोज़ ऑफ़ दि ऑथर)
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रिहायशी इलाक़े में
अलग-अलग मंज़िला औक़ात वाले
हम सैकड़ों पक्के मकान
ऊटपटांग तरीक़े से जमघट बनाए
बैठे हैं उकडू
अपनी-अपनी गोद में
मोटरसाइकलों और कारों का जमावड़ा बिछाए
फुसफुसाते हैं
ठंडी हवा में ठिठुरते
ताकि सुनाई न दे
टेम्पल्स-चर्चेज़-सुपरमार्केट्स
इत्यादि पूजा के स्थलों को
हमारी हठभरी ईशनिंदा


आए बड़े पवित्रता और अनुशासन के गड़गुम्बे
कौनसे वो आज़ाद हैं इंसान की ख़रीद-फ़रोख्त से
ऊँच-नीच से
कमसेकम घरों में लोग रहते हैं प्राकृत अवस्था में
अपनी फितरतों के सबसे क़रीब

यों धूनी रमाकर
या सुफैद परिधान ओढ़कर
खूबसूरत टोपियाँ पहनकर
कोई भुला नहीं देता नग्न फिरने का आनंद

दिन भर चन्दन मलकर
अपने परिवेश का मल दूर करके
इत्र से नहाकर भी
अंततः इन लोगों के शरीर से
निकलेगी तो टट्टी ही

शनिवार, 3 जून 2017

एकळा बळै

एकळा बळै सगळा
अबिगत कोई रेख खींच गयो
खेत-खेजड़ा-टेसण-ढोर-मिनख सब

साथ के चीज रो है रे
पड़े है अर उडे है
धोखेबाज़ चीज़ है रेत बड़ी
म्हें रमता धूणी री तरियां
घड़ी भर में सा छूमंतर सा
कोई नदी अठे खेले कोनी, प्रेम सूं बतियावण ने
बारला बके करे
रंग थारा थार रा बड़ा जोरदार छे
रंगां सूं आँख्यां आली करां, लाडी
इण भट्टे में रचीज्या हा के?
बळै सगळा
एकळा

गाँव-गवाड़ रे
पाणी में फ्लोराइड मरे
कुसमय, गीगला, कुसमय
म्हारा दांत पीळा होग्या
कमर झुक गी
हाडकां में जोर रह्यो कोनी
दो छाँट ने अडीकता
आभो भी सावळ टिके नईं
बळतां ने कोई शीतळ प्या दे
बावळा
एकळा बळै सगळा

पण
देस सूं बारे किसो धन गड्यो है
घणा देख्या रे शार थारा
रुळ ल्यो सब सड़कां पर
तपत में
पाणी रा भी पईसा लेवे
धी गा काड़
मिनख सो मिनख है के कोई बठे
जिन्ने देखो हल्लो, गीगला
ढोर ने हांके इयाँ आदमी हांके
तूँद आगले रे ढूँगाँ में ठोक अर खड़िया है लेणां में
अड़ मरूं अर धड़ मरूं
जीण ने जीव ने जग्याँ कोनी
जो चीनी हवा पूगे
बा सूंघ अर ई जमारो अस्पताळ पूग जावतों
भाईजी-भाईजी करतां गळे मायां जाळ पड़ग्या
एकळा बळै सगळा, गीगला
सारे जमारे में
एकळा बळै

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

विघ्न

तुम कूद पड़े
हज़ारों उफनते नागों के मध्य

तुम्हारी प्रदूषित फुफकारों ने,
तुम्हारी दहाड़ती कदमताल ने
रोएँ खड़े कर दिए चट्टानों के
मिटा दीं पानियों की यादें
अब वो बहते नहीं हाथियों के गालों पर
जब वो सूंड से सहलाते हैं
अपने मरे हुए बच्चों के कंकालों को
वो पानी बर्बाद नहीं कर सकते
दिन-ब-दिन विकराल होते मौत के मंज़र पर

तुमने काट डाले उनके रास्ते
तुम खा गए उनके घर
तुम बढे जाते हो आगे, उनकी आत्माओं की कंदराओं में

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

मेरी कविता "शाप" का वीडियो




मेरी 58 कविताओं का संग्रह "अन्धकार के धागे" हिन्द-युग्म द्वारा प्रकाशित किया गया है. यदि आपको यह कविता पसंद आती है तो इंफीबीम से संकलन की प्रति अवश्य आर्डर करें.


यहाँ में संकलन में से एक कविता, 'शाप' पढ़ रहा हूँ, गौर करें.

रविवार, 21 जून 2015

जूतमपैजार

पसीने से तरबतर
दढ़ियल दद्दा ने
अपने घिसे फ्रेम और मोटे लेंस वाले चश्मे को
नीले- सलेटी चैक्स छपी लुंगी पर साफ़ किया
और नए-नवेले अंधड़ में से
सड़क के पार देखा
इमारतों पर जमी धूल की चद्दरें बदल दी गयीं हैं
झाड़ दिए गए हैं पेड़ों के लिबास
हवाएं फटे गले से घोषणा करती हैं
वर्षा के आगमन की

वर्षों से जारी हानिकारक ज़र्दे के सेवन से
भूरे-कत्थई पड़े दांतों पर उन्होंने
जीभ फिराई और
नमक, पानी और धूल का मिश्रण
सड़क के किनारे थूक दिया

बारिश की जूतमपैजार के समक्ष उन्होंने अपना
झुर्रियों भरा चेहरा पेश कर दिया;
किसी कारण से उन्होंने
अपनी नवजात पोती को याद किया
जिसने चलाये थे उनके चेहरे पर
नन्ही लातें और घूंसे
और मूत्र की गर्म धार

(बुढ़ापा-)

रविवार, 31 मई 2015

बचपन ५-८

खेल
चाँदनी के उजास में
झिलमिलाती झील के किनारे
पसरे उजाड़ में
एक छोटा लड़का और एक छोटी लड़की
एक विशाल नारंगी गेंद से
खेल रहे थे;
वो सूर्य था।

स्पीड ब्रेकर
बचपन के मैदानों से निकलकर
छोटी सी छोकरी
प्यार की ढलानों पर 
उत्साह से साईकिल दौड़ा रही थी।
रास्ते में बाँध सा ऊँचा
स्पीड ब्रेकर आया …
साईकिल उछली, लड़की सड़क किनारे खड़े
अचंभित से खम्भे के आधार पर
मुँह के बल गिरी
ठुड्डी फूट गयी, रक्त बह चला।

आधिपत्य
एक गज बाई एक गज की जमीन पर
हमने अपना आधिपत्य घोषित किया
इमारतें, रेलवे स्टेशन, खेत, टंकियाँ,
सड़कें, कीचड़, टेबलें, कुर्सियाँ,
सपने, मिटटी और चुम्बन
इन सबको लेकर शहर बनाया
भीड़ और प्रदूषण से मुक्त
रीसाइकलेबल शहर
आदर्श शहर
दो सींकें गाड़कर कागज़ से स्वागत द्वार बनाया
उसपर लिखा "कॉपीराईट © ऑल राईट्स रिज़र्व्ड"

उत्सव 
कंकड़ पत्थरों से भरे
एक उबड़ खाबड़ मैदान को मैंने
समतल बनाया
और बहत्तर-बीसी कविताएँ
बड़ी नज़ाकत से बिछा दीं

आसमान से देवताओं की जमात
ताली बजाते हुए उतरी;
मेरी कविताओं पर कूद-कूद कर
एक-एक की मिट्टी पलीद कर दी।

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

बचपन : १-४

१.
मामाजी 
सूरज की बची-खुची चमक को
आसमान ने घोंट दिया
अपने सलेटी लबादे में,
ओढ़ा दिया अँधेरा
छटपटाते हुए
गांवों, जंगलों और पहाड़ों को --
और डपटकर बोला,
"चुप्प करके सो जाओ अब,
एकदम चुप्प!"

२.
नहानघर
मूसलाधार वर्षा की हिंसा
के समक्ष घुटने टेक दिए
मिट्टी के घरोंदों और पुतलों ने,
शिलाचूर्ण का समाज बह गया
अपने ही दुराग्रह में
परत-दर-परत;

आवाज़ों के विस्तृत सिंचित भूभाग
की मिट्टी के हर दाने से
फट पड़ीं कोंपलें,
निकल पड़े काँटे।

३.
अकाल 
प्रेमबाई के घर के पिछवाड़े में
एक तालाब हुआ करता था
जो अब सामुदायिक टट्टीघर है।

कभी उस तालाब ने
मानसून के जोश में उफन कर
बहा दिया था कस्बे के एकमात्र सिनेमा हॉल को।
पाल की मिट्टी को झाड़ियों की जड़ों से काट
वह भाग निकला।
पीछे छोड़ गया
उघड़ी, फटेहाल धरती,
और हरा, काई भरा रुदन करते पेड़।

४.
डाम 
पुराने अस्पताल की पीली पुती
दीवारों पर
शनैः-शनैः काई की ज़िल्द चढ़ रही थी।
गगनचुम्बी नीम के पेड़ों से
हवा के चिड़चिड़े झोंकों के साथ
झड़ जाते कबूतरों के सैलाब
और पीली पत्तियों के झुण्ड…

पानी के छोटे से तालाब में छप-छप करना
बंद करके हमने निश्चय किया
पकड़नी ताली खेलने का।
सबकी हथेलियाँ नीचे की ओर थीं, मेरी ऊपर की ओर…
दूर से मम्मी अर्जुन की भांति जूता ताने दौड़ी आ रही थी,
डाम। 

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

श्राप

अमावस्या की रात में
जंगलों में बसी आत्माएं
हवाओं के साथ तैरती
आसमान में खूब ऊपर पहुंचकर
ठहर जातीं हैं;
दुःख के साथ देखतीं हैं
धरती पर फैले हुए नासूर को
गन्दगी और दर्द से भरी नसें,
उनके ऊपर जमीं मवाद की
थोथी सुनहली स्फटिक;
व्याकुल हो फेर लेतीं हैं
अपने चेहरे

एक स्त्री का
ममतामय षट्कोणीय आनन पिण्ड
तैर आता है शहर की छत पर
डूब जाता बर्फीले शोर में
उसके रात से काले गेसुए
ढक देते
दरिद्रता के नग्न
स्तनों और पंगुता के अदृश्य
हाथों को
सुला देते
थके हारे कामगारों को
अपने आगोश में …

उसके बालों के छोर
गुदगुदाते होठों को,
खींच देते मुस्कराहट
निद्रालु शक़्लों पर

उसकी आँखों की मद्धम रोशनी
और श्वास की गर्मी में
भूल जाते हैं शहर को चलाने वाले
अपनी चिंताएं
खेलने लगते हैं अपने सपनों में
बचपन के खिलौनों की यादों से

अपने थरथराते पीले पड़ते होठों से
वो चूमती है
चौराहे की कठोर सतह,
ये कहते हुए कि,
"खूबसूरत हो तुम,
श्राप नहीं है तुम्हारा अस्तित्व।"

उसकी त्वचा को छूते हुए
बड़ी रफ़्तार से निकल जाती हैं
घबराई गाड़ियाँ

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

रात

तालाब के गीले कोनो पर
ज़िन्दगी की जेबों में
सिमट कर बैठे हैं
गुलदस्ते
अपने घर मिटटी में डुबोए
इस इंतज़ार में कि
अनिर्वचनीय गंध वाली
अँधेरे की एक लट उन्हें प्यार
कर जाएगी
बयार सा ठंडा दामन
सहला जायेगा उन्हें
हंसी की सलवटों से लदी
नाक सा नन्हा चाँद
नहला देगा चांदनी से
उनकी खट्टी उँगलियों को

वो रात है स्वयं,
उसके हाथों से बने सीप से आवरण में सूरज
औंधे मुँह सोया है
सधे हुए नंगे कदमों से
सूखे पत्तों से लदी राह पर
वो रखती है ओस के मोती
सवेरे की दूब पर,
बढ़ती है पश्चिम की ओर
छिड़कते हुए
अल्हड़ मुस्कान का प्रभात

वो चलती है पानी पर यों
जैसे तैरते हैं बादल
पर्वत श्रृंखला के सहारे-सहारे

सोमवार, 17 नवंबर 2014

दो पल का जीवन मांग रहें हैं

वचन दिया था गीता में ‘मैं आऊंगा’, पर तू होता नहीं अवतीर्ण है।
यहाँ आज जब मानवता के प्रासाद हो रहे जीर्ण शीर्ण हैं।
मनुष्य नहीं दिखते यहाँ, यद्यपि नगर ये जनाकीर्ण हैं।
होते मानव शेष यहाँ तो क्यों अस्त्रों शस्त्रों से, पृथ्वी का वक्ष होता विदीर्ण है।
हो गया है दैत्यों का राज्य फिर से, हर जीव यहाँ भयभीत है।
सूनी प्रकृति ,सूने जंगल, सब गाते मृत्यु के गीत हैं।
देखता नहीं तेरी धरती को, क्या हुआ तू अवचेत है।
बांटकर तुझे लड़ते आपस में, कहा तूने था कि तू अद्वैत है।

निरपराधों पर आग बरसाते, कहतें है ईश्वर कि आज्ञा।
अवचेत होकर दे भी हो तूने, तो क्या उनके पास नहीं है प्रज्ञा।
भूख प्यास से नन्हे जीवों का मुख, अब हो रहा है विवर्ण।
विश्व के नक्कारों में दबती पुकारें उनकी, क्या तेरे पास नहीं है कर्ण।
माना कि तुझे मानें न मानें, इसकी तुझे परवाह नहीं।
पर क्या धरती की रक्षा की तुझे रही कोई चाह नहीं।
माना कि हम समझ न पाए तुझे कभी, तेरी नहीं कहीं भी थाह है।
पर मदद कि गुहार लगायें कहाँ, तू ही सबका अल्लाह है।

धन ,धान्य, धर्मं, द्युति माँगना, मेरा नहीं स्वभाव है।
कंचन की कामना करूँ कैसे फिर, यहाँ भोजन का अभाव है।
तेरी आवश्यकता आ पड़ी अब हमें, मानव स्वयं सहाय्य में नहीं समर्थ है।
पर तू उदासीन बैठा है क्षीर में, इसका क्या ये अर्थ है।
निर्माण और पोषण करके विश्व का, अब यदि विनाश को प्रबुद्ध तू।
स्वयं ही नष्ट कर मानव जाति को, धरती को कर दे शुद्ध तू।
पर वर्त्तमान विधि उचित नहीं, न होने दे आपस में युद्ध तू।
कुचल दे धूमकेतु से हमें, यदि हमसे है क्रुद्ध तू।
पर इस अनल का कर दे शमन, तू कर दे पृथ्वी पुत्रों का उद्धार।
मृत्यु से पहले थोड़ा जी लें हम, ये अस्वस्थ मृत्यु नहीं स्वीकार।
नाश से पहले फलना फूलना सीख लें, हम जीवन जीना भूल गए हैं।
ये पल पल की मृत्यु बहुत हो चुकी, दो पल का जीवन मांग रहें हैं।