प्रलय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रलय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

धुर


किसी मुटाए हुए आदमी की अनामिका में पहनी
अंगूठी सी तुम
हतप्रभ समय-शंकु पर नकेल की तरह आरूढ़
भूतकाल की सारी घटनाएँ सिमट-गुँथकर
आतीं हैं तुम तक
और सारे संभावित भविष्य
तुमसे उत्प्रेरित
तुम्हारे होने से लक्षित
देश-काल का सुलझ जाना रिक्त व्योम में
आप्लावित इन्द्रियों के मुड़े-तुड़े बड़बड़ बिम्ब

तुम्हारा होना जैसे
ब्रह्मा की मृत्यु

बुधवार, 19 नवंबर 2014

शहर की आत्मा

बीहड़ शहर के धुर मध्य में
एक मंच पर खड़ी हो
समृद्धि गुनगुनाती है
विचारों , आदर्शों और नैतिकता
के गीत

नीचे
कचरे के गड्ढों में
भीड़ उत्पात मचा रही है।
सड़ते अवशिष्टों से
उठती घनी दुर्गन्ध से
गश खाकर गिर पड़े हैं कौए
मृत्यु की मिक्सी में

शहर के किनारों पर तबाही मचाते
दानव
बढ़ रहे हैं गुरुत्व केंद्र की ओर
विनाश की भनक पाकर
एक अधनंगा पागल भिखमंगा
व्यस्त हो गया है
पॉलिथीन की थैलियाँ जुटाने में

मल और मूत्र की चौड़ी धाराओं को
मथ रहे हैं लाखों पैर
स्वर्ण निकलने के लिए

'ये गुनगुनाहट
शहर की आत्मा है
और ये भगदड़
अस्तित्व बचाने का
संघर्ष है
ये सब जरूरी है ,
ये सब वास्तविक है। ‘
वे मानते हैं।
और वे लग जाते हैं
पुनः पसीना बहाने

जब मृत्यु के संदेशवाहक
पहुंचेंगे
तो वे चढ़ाएंगे
सुवर्ण और पॉलिथीन के
चढ़ावे
बचायेंगे अपना अस्तित्व।

(प्यार-२)

सोमवार, 17 नवंबर 2014

दो पल का जीवन मांग रहें हैं

वचन दिया था गीता में ‘मैं आऊंगा’, पर तू होता नहीं अवतीर्ण है।
यहाँ आज जब मानवता के प्रासाद हो रहे जीर्ण शीर्ण हैं।
मनुष्य नहीं दिखते यहाँ, यद्यपि नगर ये जनाकीर्ण हैं।
होते मानव शेष यहाँ तो क्यों अस्त्रों शस्त्रों से, पृथ्वी का वक्ष होता विदीर्ण है।
हो गया है दैत्यों का राज्य फिर से, हर जीव यहाँ भयभीत है।
सूनी प्रकृति ,सूने जंगल, सब गाते मृत्यु के गीत हैं।
देखता नहीं तेरी धरती को, क्या हुआ तू अवचेत है।
बांटकर तुझे लड़ते आपस में, कहा तूने था कि तू अद्वैत है।

निरपराधों पर आग बरसाते, कहतें है ईश्वर कि आज्ञा।
अवचेत होकर दे भी हो तूने, तो क्या उनके पास नहीं है प्रज्ञा।
भूख प्यास से नन्हे जीवों का मुख, अब हो रहा है विवर्ण।
विश्व के नक्कारों में दबती पुकारें उनकी, क्या तेरे पास नहीं है कर्ण।
माना कि तुझे मानें न मानें, इसकी तुझे परवाह नहीं।
पर क्या धरती की रक्षा की तुझे रही कोई चाह नहीं।
माना कि हम समझ न पाए तुझे कभी, तेरी नहीं कहीं भी थाह है।
पर मदद कि गुहार लगायें कहाँ, तू ही सबका अल्लाह है।

धन ,धान्य, धर्मं, द्युति माँगना, मेरा नहीं स्वभाव है।
कंचन की कामना करूँ कैसे फिर, यहाँ भोजन का अभाव है।
तेरी आवश्यकता आ पड़ी अब हमें, मानव स्वयं सहाय्य में नहीं समर्थ है।
पर तू उदासीन बैठा है क्षीर में, इसका क्या ये अर्थ है।
निर्माण और पोषण करके विश्व का, अब यदि विनाश को प्रबुद्ध तू।
स्वयं ही नष्ट कर मानव जाति को, धरती को कर दे शुद्ध तू।
पर वर्त्तमान विधि उचित नहीं, न होने दे आपस में युद्ध तू।
कुचल दे धूमकेतु से हमें, यदि हमसे है क्रुद्ध तू।
पर इस अनल का कर दे शमन, तू कर दे पृथ्वी पुत्रों का उद्धार।
मृत्यु से पहले थोड़ा जी लें हम, ये अस्वस्थ मृत्यु नहीं स्वीकार।
नाश से पहले फलना फूलना सीख लें, हम जीवन जीना भूल गए हैं।
ये पल पल की मृत्यु बहुत हो चुकी, दो पल का जीवन मांग रहें हैं।