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गुरुवार, 28 मई 2015

उगल

बाबू साब को लगता था
कि उनके आस-पास घूमते
हाड़-माँस के पुतले सब इंसान हैं,
और दिल के बोझे को
ऑफिस की डेस्क पर रखकर
ली जा सकती है
चैन की साँस।

कलम के रजिस्टर पर घिसटने के
प्रवाह में
उन्होंने उगल दिए पेषणी के पत्थर
और लार में डूबी भोजन की लोइयां
घृणा के साथ
बॉस ने उनकी तरफ देखा
और हवा में जुमला उछाल दिया
"कंगाली में आटा गीला"

उनकी ऊपर की साँस ऊपर रह गयी
नीचे की साँस नीचे।
तुरंत घूमकर
बटन सी आँखों में झाँका
और पाया वही मिथकीय जानवर
जिसके वास्तविक होने की संभावना से
आजतक वो भय खाते आए थे।
उनके बोझे में जुड़ गया एक पत्थर…
एक विचार,
जिससे वो नफ़रत कर सकते हैं
आजीवन।
(दुनिया के बाशिंदे-)

गुरुवार, 19 मार्च 2015

सुरक्षा

पीवर लैदर का बैग सहलाते हुए अंकल
अचानक ठिठक कर पास की
दूकान का बोर्ड देखने लगे,
उत्सुकता और जिज्ञासा से …

नीम के पेड़ की पत्तियों के बीच घुसा
जंग लगा बोर्ड
साफ सुथरे तरीके से कुछ
कह नहीं पा रहा था,
सो अपनी जांघ के सहारे
एक ग़ायब-गूंगा ढोलक
बजाते हुए
झड़ती पत्तियों को घूरने लगे।

कुछ दूरी पर
फुटपाथ से उतर कर
असंख्य सूखी पत्तियों का मरघट
रुकी नाली के रिसाव में मिलकर
कीचड़ का रूप ले रहा था;
हर दो मिनट में
हंगामा मचाती सिटी बस
गोली की तरह निकलती,
कीचड को गिट्टी में बराबर कर जाती।

अंकल ने भयातुर होकर देखा
हरीतिमा के अस्थि-पंजरों का कुचला जाना;
अपनी ऐनक से
शोर, पसीना और निराशा पोंछकर
उन्हें एक बेहतर जगह पर
खड़ा होने का निश्चय किया
बस पकड़ने के लिए,
सुरक्षित महसूस करने के लिए।

(दुनिया के बाशिंदे-२)

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

तार

गर्म पत्थरों और बारिश
के मिलन से
छस्स-छस्स करती दोपहर में
पसीने से नहाई हुई
बड़-बड़ करती औरत
दे मारती है
एक भारी हथौड़ा
ठण्डी वास्तविकता पर
और खेंचती है
खयालों के तार

जिनसे उड़ाएगी पतंगें
जो कभी न कटेंगी
कभी न गिरेंगी

बनाएगी
अवध्य-अभेद्य हवाई किले

और अमरत्व देने वाला सूट (साँचा)।

(दुनिया के बाशिंदे-१)

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

ईश्वर एक उपमा है।

राजपथ के किनारे
रात के बादलों से घिरी
एक लड़की को
हवाएं चूमती हैं
और कपडे सहलाते हैं
पर वह खूबसूरत महसूस नहीं करती ,
घसीटती हुई चलती है
अपने पैरों को
कंकरीली धरती पर
दिशाओं में कुत्ते गुर्राते हैं
और फुफकारते हैं नीम के पेड़

प्यार और गोलियाँ ,
वर्षा और विघटन
गले मिलते हैं

दीर्घ उच्छ्श्वास ,
उत्तेजित रोम ,
आत्मविश्वास।
उरोज ठोड़ी की ओर बढ़ते हैं ,
भोंहे कानों की ओर

अस्तित्व के फूल खिलते हैं
एक बार फिर
यकायक भान हुआ है
त्वचा को स्पर्श का
दृष्टि को उपस्थिति का
समाप्त हो गयी है प्रलय
उदय हुआ है आह्लाद का।

उधर तूफानों के परे
आसमान में कहीं
एक ईश्वर
उत्सव और समृद्धि के ढेर में बैठा
देखता है इस सूक्ष्म ,
नगण्य जीवन को
परिवर्तित होते
नापता है उसे अपनी हथेली
की तुलना में
व्यंग्य भरी हंसी हँसता है
द्रुत निश्वास के साथ

बड़ा गर्व है उसे ,
अपनी विशालता पर ,
शक्ति पर ,
त्रिगुणातीत होने पर …

ईश्वर मूर्ख है ,
ईश्वर विपन्न है ,
ईश्वर अपूर्ण है।

ईश्वर एक उपमा है।