शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

विघ्न

तुम कूद पड़े
हज़ारों उफनते नागों के मध्य

तुम्हारी प्रदूषित फुफकारों ने,
तुम्हारी दहाड़ती कदमताल ने
रोएँ खड़े कर दिए चट्टानों के
मिटा दीं पानियों की यादें
अब वो बहते नहीं हाथियों के गालों पर
जब वो सूंड से सहलाते हैं
अपने मरे हुए बच्चों के कंकालों को
वो पानी बर्बाद नहीं कर सकते
दिन-ब-दिन विकराल होते मौत के मंज़र पर

तुमने काट डाले उनके रास्ते
तुम खा गए उनके घर
तुम बढे जाते हो आगे, उनकी आत्माओं की कंदराओं में

सोमवार, 9 जनवरी 2017

दिवास्वप्न

अगर मेरे हाथ ढले होते किसी  बहुत ही मजबूत और कठोर धातु में,
मैं उखाड़ फैंकता 

कागज़ के आवरण
दीवारें-खिड़कियाँ-अलमारियाँ
सीमेंट-ईंटें-टाइल्स
सड़कें-मेट्रो-रेल की पटरियाँ
शहर के विशाल फैलाव
जंगल-जानवर-नदियाँ
घाटियाँ और उनकी हवाएँ
देश और दुनियाएँ


चीथड़े-चीथड़े कर देता
और होम देता आवाज़ों के बवंडर में
जो मैंने बनाए होते अपने हाथों से ही 


पर मैं माँस-हड्डी का कमज़ोर मानव
कोई कार टकरा जाए तो शिनाख्त करना मुश्किल हो जाता है

काश मैं दुर्दम्य होता ...
जब मैं चलता तो खरोंचें पड़ जातीं
धरती की छाती पर
उछलता तो भूचाल आ जाता
मैं बदल देता इस दुनिया का चेहरा अपने माकूल
ये सब सोचते वक़्त मैं नहीं सोचता
क्रमिक विकास के बारे में,
गाया थ्योरी के बारे में

बस जमाता जाता दुनिया के टुकड़े
अपने हिसाब से

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

उसूल

(कुछ दिनों पहले लिखी)

सड़क किनारे पगड़ी बांधे बुढऊ
अपने घुटनों पर कुहनियाँ रखे
करम पर हाथ बांधे
दूर बबूल की झाड़ियों में मूतते कुत्ते को देख रहें हैं
उनके मष्तिष्क में ख़याल कौंधता है
मुसलमान बड़े बढ़ गए हैं आजकल
उनकी चौधराहट छंटती है गाँव में
उनके लड़के जब बाहर निकलते हैं
तो बहु बेटियों को अन्दर टोरना पड़ता है
अगर उनकी लड़की ने किसी मुसलमान के हाथों मुँह काला करा लिया
तो पहले वे उस रांड का गला काटेंगे और फिर अपनी कलाई
(पर ऐसा होगा नहीं, उन्हें भरोसा है)

सड़क के दूसरी ओर
एक दढ़ियल प्रौढ़ लुंगी-टोपी पहने बैठा है उकडू
इन्हें चुरू जाना है, उन्हें बीकानेर
उसके गाँव में हिन्दू बड़े उछलते हैं आजकल
सभ्य-असभ्य, सही-ग़लत की लकड़ियाँ लिए घुमते हैं गुंडई में
वो भी अपनी बेटी का गला काट देगा
अगर उसने एक हिन्दू से शादी की
और कूद जाएगा ज़िन्नात वाले कूएँ में
(पर ऐसा होगा नहीं, उसे भरोसा है)

ये दोनों परिचित हैं एक दूसरे के "उसूलों" और रसूख़ से

पर ये शून्य की गोद भरती, गोद उलीचती संख्याएँ नहीं हैं
जो नफ़रत से नफ़रत को
कष्ट से कष्ट को काटकर शून्य में विलीन हो जाएँ

नहीं

उनके विचारों और "उसूलों" में दिशा है
और ये सदिश राशियाँ एक दुसरे से घुलतीं हैं, मिलतीं हैं
प्राचीन परकोटों से सर फोड़ते बुड्ढों की मिली जुली ताक़तों से
रस्ते नहीं बनते
बनते हैं कारागार
ऊटपटांग खम्भों वाले महल
शीशे के जननांगों वाले पुरुष और स्त्री
जो जन्म देते हैं पारदर्शी, सुघड़ समाजों को
जो किसी भी प्रकार से बदलने से साफ़-साफ़ मुकर गए हैं

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

दिनचर्या

हम देखते हैं, आँखों में वितृष्णा भरे
धड़धड़ाती रेलों को, डूबते पुलों को, उठते पहाड़ों को
शांति चाहते हैं, गड़गड़ाहट के अंत में
उसके इंतज़ार में
स्कूटर के पायदान पर बैठकर
अकर्मण्य हो झांकते है
शनिवार सुबह ग्यारह बजे के
तरल निद्रालू यातायात में
जहाँ छोड़ दिए थे मुट्ठी भर भूत
कुछ मिनट पहले
वो नहीं सुनेंगे किसी रखवाली की मनुहार
दौड़ते रहेंगे वीथियों और मुंडेरों पर
रात होने तक
वो सड़क पार करेंगे
सांय-सांय करके निकल जाने वाले वाहनों को छूते हुए
एक दूसरे के हाथ पकड़े
ताकते रहेंगे फिल्मों के आसमान से भी बड़े पोस्टरों को
घंटों

सोमवार, 18 जुलाई 2016

समां



कृषि मंडी के दरवाजे पर
चेचाणी जी का पग पड़ गया
बिल्ली की टट्टी पर
गुस्से के मारे उन्होंने अपने करम को गलियाँ दीं
आज नहीं निहार पाएंगे वो
घर के रास्ते पर
शाम की छाँव में लहराते पेड़
और सड़क के दोनों किनारों पर
अभ्रक की चमक