सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

नामकरण किया नहीं इसका दो साल से, पता नहीं क्यों

मजारों के दरवाज़े
तोड़ दिए गए हैं
भग्न कर दिए गए हैं
मंदिर
थरथरा रहे हैं मसीहाओं
के बुत
और लोट रहे हैं भांति भांति के गुम्बद
अवशिष्टों के ढेर में 


ढोंगी श्रद्धालुओं की भीड़
घुस गयी है बारहदरी में
जूते लिए ही
बरसा रहे हैं वो अपनी श्रद्धा
संगमरमर के फ़र्श पर
खटखटकर चलते हुए
पण्डे, पादरी और मुल्ले रो रहे हैं
विकृत शक्लें बनाकर
धाड़ें मारते

राजधानी के अन्धेरे कमरों में
खाली कटघरों को सजा सुनाते हैं न्यायाधीश
कमेटियां बनेंगी
मुआवज़े का बँटवारा होगा विजेताओं के बीच
प्रतिनिधि जाएँगे
मानवों की भोंडी नकलों के पास
देवहीन, दैवहीन
पुनः प्रतिष्ठित करेंगे
विश्वास और श्रद्धा की दुकानें
कहेंगे,
"परेड, तीनों तीन कॉलम में
झुक जाओ आगे की ओर कच्छे उतार कर;
हम तुम्हारे पिछवाड़ों पर ख़ुशी पोत देंगे!"

उनके निर्देशों का
अक्षरशः पालन होगा
क्योंकि सम्मान और अपमान के मसले
बहुत महत्वपूर्ण हैं हमारे लिए

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

कॉलोनी - 1

(द व्यूज़ एक्सप्रेस्ड हियर डू नॉट रिफ्लेक्ट दोज़ ऑफ़ दि ऑथर)
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रिहायशी इलाक़े में
अलग-अलग मंज़िला औक़ात वाले
हम सैकड़ों पक्के मकान
ऊटपटांग तरीक़े से जमघट बनाए
बैठे हैं उकडू
अपनी-अपनी गोद में
मोटरसाइकलों और कारों का जमावड़ा बिछाए
फुसफुसाते हैं
ठंडी हवा में ठिठुरते
ताकि सुनाई न दे
टेम्पल्स-चर्चेज़-सुपरमार्केट्स
इत्यादि पूजा के स्थलों को
हमारी हठभरी ईशनिंदा


आए बड़े पवित्रता और अनुशासन के गड़गुम्बे
कौनसे वो आज़ाद हैं इंसान की ख़रीद-फ़रोख्त से
ऊँच-नीच से
कमसेकम घरों में लोग रहते हैं प्राकृत अवस्था में
अपनी फितरतों के सबसे क़रीब

यों धूनी रमाकर
या सुफैद परिधान ओढ़कर
खूबसूरत टोपियाँ पहनकर
कोई भुला नहीं देता नग्न फिरने का आनंद

दिन भर चन्दन मलकर
अपने परिवेश का मल दूर करके
इत्र से नहाकर भी
अंततः इन लोगों के शरीर से
निकलेगी तो टट्टी ही

रविवार, 3 दिसंबर 2017

फैरो

वहाँ गाँव के बाहर
धोरों के बीच टट्टी करते बुड्ढे का सर
किसी ने दग्गड़ से कुचल दिया
शिनाख्त नहीं कर पाए उसके नज़दीकी रिश्तेदार

रेबीज़ से सनके कुत्तों का झुण्ड
बावला हुआ सड़क से उतर गौशाला के पास
घाटी में गहरे उतर गया
उनकी लाशें कई किलोमीटरतक छितराईं पायी जायेंगी
फूली, गंधाती

धोरे पर बबूलों के झुरमुट
और गन्दगी के ढेरों के बीच कोई लोमड़ी
क्रोध भरी हूक रही है

सुबह सेना के काफिले के आख़िरी ट्रक के निकलने से पहले
एक हिरण धैर्य खो बैठा
चीलें उसके अंतरंगों को कई दिन खाएंगी
उसके हड्डी और चमड़े के ओरीगामी में बदल जाने तक

चींटियों के नगर पर पपड़ियाई भूमि पर
चींटियाँ फिरतीं हैं कूदती फाँदतीं
किसी फैरो की तरह चमकती स्वर्णिम देह लिए
एक समाज में रहने में निष्णात

राजधानियों के लोग यहाँ की तस्वीरें देख कर नाक भौं सिकोड़ते हैं
और कहते हैं कि कोई जीना सिखाओ इन गवारों को.

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

कठोर

रेत और ठण्ड ने यहाँ की रातों के चेहरे
कठोर कर दिए हैं
उनमें धोरों की छाहें और बादलों की सलवटें हैं
उनकी आँखों में सितारों की साफ़-सुथरी झिलमिलाहट है
पथरीली राहों पर वो बिछातीं हैं प्रलय का शोर
और छोटे मोटे झरने
लबालब नदियों का खालीपन उनकी आँखों से बहता है
इस्पात के जंजाल में उनकी खनखनाती हँसी

अन्धकार में घिसटते विस्थापितों से विमुख वो
चाँद का दीर्घ निःश्वास छोड़तीं हैं
वो अपने शरणार्थियों
को पुचकार कर बुलातीं नहीं हैं
बस देखतीं रहतीं हैं भावहीन
जैसे कोई देखता है किसी रेल के जाने को
जिसमें उसे चढ़ना नहीं है

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

बकरी के लिए रसगुल्ले


हिनहिनाते हुए स्कैनर्स
तेज, गोल मटोल और दक्षिण को झुके हुए
खुली अलमारियों में
इतिहास की घोड़ेदार किताबें
जैसे कोई छुई-मुई


बारह बहियाँ, दो सौ पेट
अपने में ब्रह्माण्ड समेट

नहींनहीं
येक्यालिखदिया
फिरसेलिखनापड़ेगा

तेज, गोल मटोल और दक्षिण को झुके हुए
गुम्बदों के भाल पर चीथड़े सूखे हुए
स्कैनर्स -- हिनहिनाए
भरा गुड़कता लोटा, खोट समेत ही लौटा
उसकी धृष्टता पर हमें खेद है
पर इसमें रेल का देरी से चलना कारण नहीं है
हटाओयारकुछऔरलिखतेहैं
साक्षात् अल्ला की मर्ज़ी से
हैं?

अल्ला? अल्ला यहाँ लूणी के घाटों की देवी है
सब घाटों की
उनके सर पर काँटों का ताज़ है
और अधोवस्त्र के तौर पर स्क्विड के छुअन्तुओं का घाघरा
हम और किसी अल्ला को नहीं जानते
---
तो साक्षात् अल्लाबीबी की मर्ज़ी से
सिसीफस पत्थर लुढ़काता बीबी के गुणगान करता आगे बढ़ा
चोटी पर पहुँचकर उसने सूखते चीथड़ों में से एक
बीबी के नोन-इश्टोप सेवक पहाड़ी बकरे को दिया
और पत्थर को दक्षिण दिशा की ढाल पर रवाना किया
ग्रामीणों ने बीबी की पीठ की ओर से आते पत्थरको
उनका प्रसाद माना
और वेदों ने उनका गुणगान किया
देवताओं ने पुष्पवृष्टि की
जनसाधारण से जयजयकार किया
प्रसाद लुढ़कता हुआ हेडीज़ पर बने बाँध से जा टकराया
चट-चट-चट करके बाँध फटा
बाँध की डूब में फंसे जीवों और वनस्पति की आत्माओं
को मुक्ति प्राप्त हुई
हेडीज़ अब लूणी बन गयी
पांच साल में एक बार बहती है
घाट उसके किनारे फिर भी बना दिए गए हैं
सभी पर अल्लाबीबी की मूर्तियाँ स्थापित हैं
श्रद्धालुओं का मेला लगता है
जो कोई प्रसाद पाता है, धन्य हो जाता है
स्कैनर्स-लोटे-रेलें हिनहिनाए
वेदों ने उनका गुणगान किया
देवताओं ने पुष्पवृष्टि की
बोल अल्लामाता की जय

अबठीकहै

अरे ठीक कैसे है?
खुली अलमारियों में
इतिहास की घोड़ेदार छुईमुई किताबें?
दिव्य दर्शन से भरे बारह बहियाँ, दो सौ पेट?
उनका क्या हुआ?
लोटे के प्रासंगिक होने का क्या आशय है?
रेल के अप्रासंगिक होने का क्या आशय है?
.
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सुण भेंणचोद
सुबह से पडारा पसार के बैठा
बीबीगान को ध्यान से सुने नहीं है
मैं तब से भूखा-प्यासा अरड़ा रहा हूँ
प्रसाद पा के निकल यहाँ से मुफ़्तखोर


चलो भाय
आज के आनंद की जय
जहां मतिमंद घूमते होकर अभय
सर ऊंचा करके
फ़ोकट में ज्ञान प्राप्त करते
बीबी की उस पावन भूमि की जय
हर हर बहादेव!